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आये फिर दिन
उजले खरगोश-से
आये फिर दिन
धुंध के उतार वस्त्र
निकली है भोर
मृगछौनी धूप करे
डार-डार शोर
लग रही है आँख-आँख
सचमुच कमसिन
साबुन से धुली-धुली
फैल गयी साँस
नीलकंठ हो गया
नभ का संत्रास
सपने उजियालों के
आँख रही बिन
नहा रही दूध से
सूरज की धार
खेल रहा यौवन फिर
बचपन के द्वार
लगा रही बालों में
घास नये पिन
क्षितिजों तक फैल गये
धुले-धुले ठाँव
बाग-बाग खेत-खेत
बैठ रही छाँव
कोयल की कूक रही
सुधियों को गिन
कैलेंडर में धूप
आज फिर
कैलेंडर में धूप है
तारीखें गंधों की
आओ, दीवारों पर टाँगें
एक नये सूरज का जन्मदिन
पिछली तारीखों में
रात थी - कोहरे थे
असमी संध्याएँ थीं
घटनाएँ थीं उदास
थकी हुई साँसें थीं
वन्ध्या आस्थाएँ थीं
लिन्तु आज फिर
वसंत के दिनांक हैं
किरणें हैं आतुर कमसिन
कितने ही
आतप-वर्षाएँ
पतझर औ' बर्फ झेलकर
लौटे हैं
रितुराजी सपने
गीतों के लेकर आखर
और गये वर्ष को उतार कर
फेंक रहे पलकों से
नये-उगे छिन
एक जापानी सुबह
आँख 'उगते सूरजों का देश' है
आइये, कल्पित करें
एक जापानी सुबह
धूप 'गीशा गर्ल' है
उजली नहायी
नील नभ का कर रही स्वागत
खिड़कियाँ सारी खुली हैं
दिख रहे हैं
दूर तक के पथ
बुद्ध-प्रतिमा-सा शांत ध्यानामग्न
जल रहा है बह
अतिथि सूरज के लिए
हो रहा है 'चाय-उत्सव'
लॉन के मन में
हाइकू लिखती हवाएँ हैं
टहनियों पर
साँवले वन में
यह नहीं 'हाराकिरी' का है समय
साँस से सपने रहे हैं कह
यह अनोखी शाम
नदी का जल बह रहा है
दूर
तिरती जा रही है
यह अनोखी शाम
बीच धारा में खड़ी है
धुत सुनहली
रोशनी की नाव
खे रही है डूबता सूरज
घाट पर से
टहनियों की छाँव
कह रहे
अलविदा पनघट से
झिलमिलाते घाम
हो गया आकाश मद्धिम
धूप की
परछाइयों को झेल
रेत पर
अंतिम किरण के
बिछ गये हैं सोनपंखी खेल
हर लहर में बस रहे हैं
फिर
चिनारों के नगर अविराम
बिजली के तारों पर
बैठे हैं फगुनाये सुग्गे
पेड़ों से उतर आयी लॉन पर
धूप की गिलहरी
एक फूल गुड़हल का
खिल गया
आँखों के बाग़ में
साँस हुई शहनाई
हरी हुईं इच्छाएँ
कोंपल की बास से
हो गयी सुनहरी परछाईं
बेंच के किनारे तक
आ पहुँची धूप-गुलदुपहरी
काँटों के बाड़ पर
बिछे हुए यादों के गुलमोहर
हो गये सलौने
बौराये आम के
दरख्त के नीचे आ बैठे
मन के कस्तूरी मृगछौने
उस पर अब
कोयल-मैनाओं की लग रही कचहरी
पुष्पों की नयी कथा
फगुनाये जंगल में
फिर पिछले साल
सूरज को टाँग रहे जेब से निकाल
उजले सूर्योदय ले
किरणों के झुंड
लगा रहे
पेड़ों के भाल पर त्रिपुंड
महक रहे यादों में सरसिज के ताल
पुष्पों की नयी कथा
सुनते आकाश
टेसू को साथ लिये
घूमते पलाश
मन में फिर जगा रहे धूप के सवाल
परियों के शिविर हुए
सारे सीमांत
सुख की इच्छाओं में
साँस है अशांत
नये वस्त्र पहन रहे पर्वत के ढाल
टँगे हुए जाल
रेत बहुत गहरे हैं
छिछले हैं ताल
ताक रहे सन्नाटे फावड़े-कुदाल
पपड़ाये चेहरों पर
टिकी हुई भूख
गहराते मेंहों की
साँस गयी सूख
कौन कहे कितने हैं पथराये ताल
आँगन को अगियाती
रोज़ कड़ी धूप
पानी हैं माँग रहे
बौराये कूप
दिन कैसे गुजरेंगे - पूछते पुआल
दर्द ओढ़ सोते हैं
मछुआरे गाँव
झीलों से कहाँ गये
मछली के ठाँव
सोच रहे खूँटी पर टँगे हुए जाल
आहत हैं वन
भूल गये मौसम मधुमास के वचन
आहत हैं वन
आखेटक कई खड़े
सरहद के पार
कोंपल की घटनाएँ
हो रहीं शिकार
छूट रहे पेड़ों से हैं अपनेपन
काँप रहे ऋतुओं के
आखिरी पड़ाव
साँझ-ढले
पतझर के हैं गहरे दाँव
नीरव में गूँज रहे अपराधी छन
धुंध के किलों में
है बंदी आकाश
संकट से घिरा हुआ
फागुनी पलाश
एकाकी डूबा है सोच में विजन
बीमार रितु के आँकड़े
पीली हवाएँ लौट आयीं
नीम के पत्ते झड़े
नंगे बदन सूरज खड़े
साये हवा में उड़ गये
ढाँचे हुए सारे तने
केवल बचे हैं ठूँठ कुछ
बूढ़ी सुबह के सामने
दालान की है नींद टूटी
रास्ते सूने पड़े
पोखर-किनारे के शिवाले
सोचते चुपचाप हैं -
क्यों जल अकेले धूप में
सोये हुए मुँह-ढाँप हैं
गिनती लहर है रात-दिन
बीमार रितु के आँकड़े
आदरणीय कुमार रवीन्द्र जी
ReplyDeleteसादर प्रणाम !
अंतर्जाल पर आपका ठिकाना पा'कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । आपके नवगीत जहां भी ( पचासों पत्रिकाओं में ) पढ़े , एक एक को दो-चार बार अवश्य पढ़ा । मैं आपका भक्त हूं ।
मधुकर गौड़ जी से मोबाइल वार्तालाप के दौरान कई बार आपका नाम लिया है मैंने …
यहां मैं आपको प्रणाम कहने के लिए ही ठहरा हूं अभी , आपकी रचनाओं पर कुछ कहने की मेरी सामर्थ्य कहां ?
हां , तसल्ली से आपकी रचनाओं को पढ़ने से प्राप्त आनन्द की सूचना अवश्य देने पुनः आऊंगा
हार्दिक शुभकामनाएं !
समय मिले…
और मेरे ब्लॉग पर आप पदार्पण कर पाएं ,
कुछ कह पाएं तो मेरा परम सौभाग्य होगा ।
यह है लिंक
http://shabdswarrang.blogspot.com
शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार