Yeh jo Holi
by Kumar Ravindra on Friday, March 18, 2011 at 10:15am
यह जो होली उदास है, भाई
कैसे कह दें कि खास है, भाई
कल हवाओं में रंग बिखरे थे
आज धुँधला उजास है, भाई
रंज़-ओ-ग़म इस कदर ज़माने में
ले रहा दिन उबास है, भाई
आयने में जो अक्स है दिन का
झुर्रियों का लिबास है, भाई
है गुफाओं की इसमें आबोहवा
और मरघट भी पास है, भाई
झील कब तक रहेगी ज़िंदा यह
कई सदियों की प्यास है, भाई
एक पत्थर-महल है बस्ती में
हो रहा वहीं रास है, भाई
कल जिसे लाये शाहजी अपने
यह वही नकली घास है, भाई
एक रंगीन ख़त मिला पिछला
उसमें रंगों की बास है, भाई
फाग होगा हवाओं में कल फिर
यही बस एक आस है, भाई
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