Friday, December 30, 2011

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नए वर्ष के गीत

           *
अभी बरस बीता है
कल होगी भोर नए साल की

बीच के अछूते पल
सपनों के
कहते हैं हाल
गैर-अपनों के

बाँध रहा
वक्त का मछेरा है
गाँठ नई सूरज के जाल की

जलसे के बाद
शहर सोया है
बच्चा जो भूखा था
रोया है

आसमान से
बरसी राख थी
झील मरी - घटना है हाल की

बर्फ जो जमी है
कल पिघलेगी
अलबेली किरण नई
निकलेगी

आशा है
धुंध छंटेगी - 
लहर-लहर सरसेगी ताल की

             *
नया साल 
बच्चों की आँखों में नये-नये सपनों-सा
                                  नया साल

      पत्तों में धूप-छाँव 
      लुकाछिपी किरणों की
      भोली इच्छाएँ हैं
      आँखों में हिरणों की

नया साल
पिछली शंकाओं का तोड़ रहा इंद्रजाल
                                  नया साल

       मूँगे के टापू पर
       हलचल है नावों की
       चर्चाएँ होतीं फिर
       परियों के गाँवों की

नया साल
बर्फ के इलाकों में बिछा रहा है पुआल
                                नया साल

      मेंहदी की छवियाँ हैं
      भोर की हथेली पर
      नाच रहे मोर मस्त
      खेत में - हवेली पर

नया साल
लाया है साथ कई नये-नये यह सवाल
                                नया साल                                       
              

              *    
जन्मदिन यह नये सूरज का
सब सुखी हों

सुबह ने जो खत लिखा
शुभकामना का
उसे बाँचो
हवा महकी
पत्तियों ने किया नर्तन
संग नाचो

वक्त है यह, बंधु, अचरज का
                 सब सुखी हों

लिख रहीं 'शुभ लाभ' किरणें
ठूँठ चंपा के सिरे पर
जप रहा है मंत्र सपनों के 
उधर बूढ़ा दुआघर

रंग बिखरा स्वर्ण-नीरज का
                 सब सुखी हों

हँसा बच्चा
बांसुरी के सुर बजे हैं कहीं भीतर
लिख रहा दिन
ओस-भीगी घास पर है
नेह-आखर

याद आया विरुद पदरज का
                सब सुखी हों              
           

           *
झुंड-झुंड उड़ रहे कबूतर
             आसमान में
नये साल का पहला दिन है

सुखी लग रही
धूप-नहाये चंपा पर
फिर रही गिलहरी
लड़का गया इधर से, देखो
अभी बजाता हुआ पिपहरी 

ढोलक बजी
गली के नुक्कड़ के मकान में
नये साल का पहला दिन है

बच्चा हँसा पड़ोसी के घर
वही, बन्धु, सुर
नये साल का
सोनबरन है कौंध हवा में
जल सोनलाया उधर ताल का

भोग रहा सुख
आँगन डूबा हुआ ध्यान में
नये साल का पहला दिन है

राख हुई थी जो पगडंडी
उस पर भी
उग रही घास है
मौसम भीतर का भी, देखो
पहने फूलों का लिबास है

जोगी का  
इकतारा बोला नई तान में
नये साल का पहला दिन है               
        

          *
भाई, मानें
यह कैलेंडर बुढ़ा गया है 
इसे हटाएँ 

दिन उत्पाती रहे और ठग
उन्हें न टेरें
रामनाम की उलटी माला 
बन्धु, न फेरें

स्वस्थ-सुखी हो
सीधी-सच्ची 
ऐसी पावन तिथियाँ लाएँ 
 
राजा चेतें
परजा रहे न भूखी-नंगी
फिर हरियायें
बरगद की शाखें जो सूखी

धुएँ न सिरजें
आग लगी जो केसरवन में 
उसे बुझाएँ 

जुम्मन-रमुआ की आँखें भी
रहें न सूनी
छप्पर-छानी
झोरें नहीं हवाएँ खूनी

हुई कोयला
वही काठ की हाँडी
मत हर बार चढाएँ 

Tuesday, July 26, 2011

Meri Bangkok-Yatra

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यह एक यात्रा 
अनूठी अलग किसिम की 

१८ जून २०११ 
और ... अर्द्धरात्रि की यह उड़ान| हवाई यात्रा का और विदेश यात्रा का भी यह मेरा पहला-पहला अनुभव| वायुयान पर बैठने, उससे नीचे धरती को निहारने, उससे परे होकर उसके अनुभवों को सँजोने- उन्हें तटस्थ होकर परखने का यह अधूरा अवसर मुझे असंतुष्ट छोड़ गया है| रात के घने अँधियारे में भारत की राजधानी महानगरी दिल्ली की चमचमाती रोशनियाँ भी कुछ पलों में ही विलीन हो गयीं और हम तैरने लगे एक निरभ्र अंधे आकाश में| बाहर का वह सब कुछ लीलता अंधकार और विमान के अंदर की अर्द्ध-निमीलित जोत में हम सभी यात्री| मेरा मन कल्पना में बाहर की आकृतियों को तलाशता, भीतर-भीतर बाहर की अनदेखी-अनचीन्ही छवियों को निरखने की निरर्थक चेष्टा करता| साथ में सरला बैठी हुई संभवतः अधमुँदी आँखों में अलस सपनों को सँजोती | राहुल, हमारा बेटा, मोनिका, हमारी बहू हमारे पोते-पोती - शाश्वत और काश्वी के साथ हमारी पीछे की सीट पर बैठे हैं| वहीं आसपास हमारे समूह के अन्य  यात्री यानी मोनिका के माता-पिता, सोमेन्द्र जी एवं बीना जी, उसके बहन-बहनोई, दीपाली एवं हृदय, उनके  दोनों बेटे अभिन्न एवं आकर्ष और हमारे दामाद जी विवेक बैठे हुए हैं| सीट नं. १७ इ और एफ़, जिस पर हम दोनों पति-पत्नी बैठे हैं, की ओवल आकार की छोटी-सी खिड़की से यान का किसी बृहद पक्षी के डैने जैसा विंग दिखाई दे रहा है| उसी से पता चल रहा है कि हम आकाश में यात्रा कर रहे हैं, वरना विमान का उड़ना वैसा ही लग रहा है जैसे धरती पर किसी बस या ट्रेन का तेजी से चलना| यान के इंजन की आवाज़ भी किसी सुपरफास्ट ट्रेन के जैसी हीयान के बैंकाक हवाई अड्डे पर उतरते समय ऊपर से बैंकाक शहर को देखना एक अद्भुत अनुभव रहा मेरे लिए | लगा कि जैसे हम किसी अलौकिक तारक-नगरी में प्रवेश कर रहे हों|  

हम समय के उस ज़ोन में जा रहे हैं जो भारत के टाइम ज़ोन से लगभग डेढ़ घंटे आगे है यानी जब हम थाईलैंड की राजधानी बैंकाक महानगरी के सुवर्णभूमि हवाई अड्डे पर उतरे तो सुबह के पाँच बज चुके थे, जबकि अभी भारत की हमारी हाथ-घड़ियों, मोबाईल घड़ियों में रात्रि के पिछले पहर के साढ़े तीन ही बजे हुए थे| हवाई अड्डे पर इस आशय की घोषणा की जा रही थी कि हम अपनी घड़ियों को वहाँ के टाइम ज़ोन के अनुसार सही कर लें| हवाई यात्रा का एक ही विशेष अनुभव हमें हुआ - वह था लैंडिंग करने से कुछ पूर्व कानो में अचानक उत्पन्न हुई पीड़ा और कुछ समय के लिए कानों का सुन्न हो जाना| दस-पन्द्रह मिनट में सब कुछ सामान्य हो गया|


१९ जून २०११ 
भारत के नये बने इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय वायु-अड्डे के मुकाबले में सुवर्णभूमि एयरपोर्ट छोटा है और उतना 'सौफिस्टिकेटेड' और साफ-सुथरा भी नहीं है| बाहर आकर यहाँ के टैक्सीवालों से होटल तक ले जाने के लिए बात करना एक विकट समस्या रही - हिंदी या अन्य कोई भारतीय भाषा तो उन्हें आने का सवाल ही नहीं था, अंग्रेजी भी उनकी कुछ शब्दों तक ही सीमित थी| किसी तरह तीन टैक्सियों में हम सभी समा  गये और करीब पौन घंटे की टैक्सी यात्रा के बाद हवाई अड्डे से लगभग चालीस किलोमीटर दूर बैंकाक नगर के साथोर्न इलाके में स्थित अपने गन्तव्य फ्युरामा एक्स्क्लुसिव होटल पहुँच गये हैं| हमारे सुइट्स की बुकिंग दोपहर बारह बजे से है और हम वहाँ आठ बजे ही पहुँच गये हैं| अस्तु थोड़ी असुविधा तो हो गई है| होटल मैनेजमेंट ने साढ़े दस बजे तक कमरे दे देने का आश्वासन दिया है| तब तक हम उनके स्वीमिंग पूल कॉंप्लेक्स में जाकर स्नानादि नित्य-क्रियाओं से निबट लिए हैं| राहुल-शाश्वत-हृदय-अभिन्न और सोमेन्द्र जी तो पूल में संतरण करने का सुख लेते रहे

हमारे होटल में पहुँचते ही मोनिका द्वारा पहले से फोन द्वारा संपर्क किए हुए हमारे बैंकाक-भ्रमण के पर्यट गाइड माइक मिल गये| वे एक हँसमुख स्वभाव के युवा व्यक्ति हैं| दुबले-पतले साँवले रंग के माइक हम भारतीयों जैसे अधिक लगते हैं - उन्होंने अपने स्वभाव से जल्दी ही हम सब के मन को जीत लिया|  

लगभग साढ़े दस बजे भरपेट नाश्ता करके हम निकल पड़े हैं भ्रमण हेतु| तब तक एक कमरा खाली हो चुका था - उसी में हम सब का सामान रख दिया गया और हम निकल पड़े बैंकाक स्थित विभिन्न दर्शनीय स्थलों को देखने हेतु| हमारा पहला पड़ाव है वॉट पो यानी बोधिवृक्ष मन्दिर| इस मन्दिर में स्थित वटवृक्ष पता नहीं मूल बोधिवृक्ष का कितनी दूर का वंशज है, पर उसका यहाँ के बौद्ध मतावलंबियों के लिए वही महात्म्य है| थाईलैंड प्रमुख रूप से एक बौद्ध देश है| यहाँ पर जगह-जगह बौद्ध-मन्दिर की प्रतिकृतियाँ देखने को मिलती हैं| हमारे होटल के बाहर भी इसी तरह का एक लघु-मन्दिर स्थापित है| रास्ते में जाते हुए भी हमें दुकानों-मकानों के बाह्य परिसर में इस तरह के मन्दिर देखने को मिले|  माइक ने हमें बताया कि यहाँ की नब्बे प्रतिशत आबादी बौद्ध मतावलंबी है| इस दृष्टि से थाईलैंड की हमारी यात्रा का शुभारंभ इस मुख्य बौद्ध मन्दिर से होना उचित ही था| यह मन्दिर १७८२  में बैंकाक के राजधानी-नगर की थाईलैंड के राजा राम प्रथम के द्वारा स्थापना से काफी पहले का है| सत्रहवीं शताब्दी में किसी समय इस मन्दिर का निर्माण हुआ था| राजा राम ने अयूथया (भारत के 'अयोध्या' का ही थाई रूपांतरण) से तमाम मूर्तियों और अन्य कलात्मक कलाकृतियों को लाकर इस मन्दिर को 'वाट फ्रा चेतुफान' का नाम देकर इसे राजघराने के पूज्य देव-मन्दिर के रूप में मान्यता दी| उसके छोटे पुत्र राम तृतीय ने १८३२ में इस मन्दिर को और अधिक विस्तार दिया और मन्दिर को एक शिक्षणकेंद्र के रूप में विकसित किया| एक प्रकार से यह थाईलैंड का पहला विश्वविद्यालय केंद्र बना| शयन करते बुद्ध की मूल प्रतिमा को उसने वर्तमान रूप दिया और उस विहारन यानी बृहत् कक्ष का भी निर्माण करवाया, जिसमें आज मूर्ति स्थापित है|


मन्दिर का परिसर खूब खुला हुआ है और उसमें प्रवेश करते ही एक पवित्रता का अहसास हमारे मन पर तारी हो गया है| मुझे दक्षिण के प्रसिद्ध मन्दिरों विशेष रूप से चिदंबरम के मन्दिर की बरबस याद हो आई| परिसर में बाहर  ही एक छोटा-सा स्तूप हमें दिखा| माइक ने बताया कि उसमें मन्दिर के प्रमुख भिक्षुओं की अस्थियाँ रखी हुई हैं| मन्दिर के विशाल परकोटे में एक छोटे-से द्वार से हमने जब प्रवेश किया तो अंदर की
पूरी परिक्रमा में हमें सुनहरे वर्ण की विभिन्न आकारों की सुखासीन बुद्ध-प्रतिमाएँ देखने को मिलीं| माइक ने बताया कि उनकी संख्या १०८ है| एक सौ आठ की संख्या का भारतीय सन्यासी और पूजा-परंपरा में विशेष स्थान हैस्वर्णकांति इन मूर्तियों से घिरा अन्यथा लगभग एक बौद्ध विहार के जैसा मन्दिर का सादा बाह्य परिसर हमें सम्मोहित कर गया| बाहरी प्रांगण में बने पत्थर के बृहदाकार बहुमंजिला दीपाधार प्राचीन काल की प्रकाश-व्यवस्था की आज भी गवाही दे रहे हैं| कैसा लगता होगा यह सारा मन्दिर परिसर जलते दीपों की स्निग्ध प्रकाश व्यवस्था में, मैं अपनी कल्पना में उस सारे दृश्य को संजोता रहा|  भूमिपाल नौ नरपतियों द्वारा निर्मित इस मन्दिर के अंदर के गलियारों में स्थित चार 'चेदि'-स्थलों को देखते हुए हम पहुँच गये है मुख्य मन्दिर के द्वार पर| माइक ने बताया कि ये 'चेदि'स्थल भगवान बुद्ध के चार प्रमुख शिष्यों की स्मृति में बनाये गये हैं|  मुख्य मन्दिर में तमाम छोटी-बड़ी बोधिसत्व प्रतिमाओं से घिरे  स्वर्णकांति भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा के सामने नमन करना, उस विशाल गर्भगृह के समृद्ध चित्रांकित परिवेश को आँखों में समोना एक अभूतपूर्व अनुभव रहा| उस सौन्दर्य को कैमरे की एक क्लिक में समेटना संभव नहीं  था| उसके चारों और की दीवारों पर और कक्ष के विशाल स्तंभों पर की गयी बारीक और समृद्ध चित्रकारी   ने मेरे चित्रकार मन को अभिभूत कर दिया| मैं अतृप्त-मन मंत्रमुग्ध निहारता ही रहा उस अलौकिक सौन्दर्य को मन्दिर से बाहर निकलकर मुझे लगा जैसे कि मैं अपना कोई घनिष्ठ परिचित अंश अंदर ही छोड़ आया हूँ| भगवान बुद्ध मेरे मन को सदैव ही आकर्षित करते रहे हैं और आज मैं अपने अवचेतन में परिव्याप्त उसी आकर्षण को और अधिक समृद्ध करके लौट रहा हूँ, ऐसी सुखद प्रतीति मुझे वहाँ से निकलकर बार-बार होती रहीइसी परिसर में स्थित है भगवान बुद्ध की शयन करती १४५ फुट लंबी विशालकाय स्वर्ण प्रतिमा, जिसे कैमरे की एक छवि में समेटने की हमारी सारी कोशिश नाकामयाब रही| अलग-अलग कोणों से और अंश-अंश ही हम उस छवि को देख पाए और वैसे ही उसे कैमरे में कैद कर पाए| उस अनंत-छवि आकृति को देखकर मेरे मन में श्रीमदभगवतगीता के भगवान कृष्ण के विराट स्वरूप का बिम्ब अनायास ही उभर आया| सृष्टि की अनन्तता ही जैसे उस प्रतिमा में रूपायित हो गयी थी| उसके सन्मुख खड़े होकर अपनी बौनी क्षुद्रता एवं लघुता का भी अहसास मुझे बार-बार होता रहा| आश्चर्यचकित मैं निहारता रहा मनुष्य की असीमित परिकल्पना और उसके अनंत सौन्दर्यबोध की अद्भुत महानता को| मनुष्य के भक्तिभाव और असीम के प्रति श्रद्धा से उपजे उस देव-विग्रह को अवलोकना अपने-आप में एक अलौकिक अनुभव रहा मेरे लिए| मैं सोचता रहा कि मनुष्य अपनी सीमित देह से कितने-कितने चमत्कार रच सकता है, यदि उसमें सात्विक आस्था का उदय हो जाये|  पूरा  मन्दिर-परिसर एक बृहत चित्रशाला-सा - अजन्ता गुफाओं की चित्रात्मकता के समानांतर, किन्तु उससे कई गुना विशाल और कई अर्थों में उससे भी अधिक भव्य और समृद्ध लगा मुझे यह चित्र-परिसर| सदियों की साधना का प्रतीक यह देव-मन्दिर, सच में, मुझे अनंत जन्मों तक समृद्ध कर गया| वहाँ से निकलने के बाद भी वह स्वप्नलोक मुझे टेरता रहा|  

और .. अब हम आगये हैं ईस्वी सन १७८२ में चक्री वंश के स्थापक राजा राम प्रथम द्वारा निर्माण कराए गये राजमहल-परिसर को देखने| उसके पूर्व चाओ फ्राय नदी के पार स्थित थोनबुरी में स्याम राज्य की राजधानी थी| नये सम्राट को वह राजधानी कई दृष्टियों से सही नहीं लगी और उसने नदी के इस पार एक नई राजधानी बनाने का निर्णय लिया| वर्तमान बैंकाक को उसने तब नाम दिया था रतनकोसिन (संभवतः  संस्कृत शब्द 'रत्नकोश' का ही थाई रूपान्तर), जिसका थाई भाषा में अर्थ होता था 'रत्नमूर्ति का आवास'| वस्तुतः उस धर्मप्राण राजा ने पुराकाल में लाओस के वियनतियाने राजनगर ले जाई गई बुद्ध की अति-प्राचीन मूर्ति को सन १७७८ में लाओस पर विजय-अभियान के उपरांत प्राप्त कर उसे थोनबुरी में लाकर राजघर के पूज्य देव-विग्रह के रूप में स्थापित किया था| उसी मूर्ति को उसने अपनी नई राजधानी के स्वामी-देव की मान्यता देते हुए राजमहल में स्थापित किया| उस मूर्ति का भी अपना एक अनूठा इतिहास
है| चिआंग माई के एक बौद्ध भिक्षु द्वारा ईस्वी सन १५१७ में रचित पुराग्रन्थ जिनाकलामालिनी' के अंनुसार राजा तिलोक के शासनकाल ( १४४१-१४८७) में इस मूर्ति को चियांग राय नामक स्थान से जहाँ यह प्राप्त हुई थी, लाकर चियांग माई में स्थापित किया गया| उस समय इस पर एक प्लास्टर की परत जमी हुई थी| उसके कुछं अंश के प्लास्टर के एक दिन झड़ जाने से उसके वर्तमान हीरक-स्वरूप का पता चला| जिस भिक्षु ने इसे वर्तमान स्वरूप दिया, उसने इसके हरे रंग के कारण इसे पन्ना-मूरत का नाम दिया|  वस्तुतः यह मूर्ति सूर्यकांत मणि की बनी हुई है| १५५२ में इसे राजा चैचेत्था द्वारा जो स्याम राज्य का जामाता था और स्याम के साथ-साथ लाओस का भी शासक था, इसे लाओस ले जाया गया, जहाँ १५६४ में इसे नई राजधानी वियनतियाने में स्थापित किया गया| वही मूर्ति सन १७७८ में राजा राम प्रथम द्वारा दोबारा थाईलैंड के प्रमुख देवता के रूप में स्थापित की गई| राजमहल के परिसर में स्थित यह मूर्ति आज भी आम थाई जन के लिए आस्था और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है|                   

इस राजमहालय का प्रवेश द्वार किसी भी आधुनिक महल-आवास जैसा ही है| उसके बाहर के लॉन आदि भी वैसे ही हैं, किन्तु अंदर प्रवेश करते ही लगता है जैसे हम किसी पुराकाल के संसार में आ गये हैं| 'वाट पो' के जैसी ही मंडप एवं शिखर शिल्पाकृतियाँ यहाँ भी - वैसी ही भव्य, मनोरम, समृद्ध और सजावट से भरपूर| हम चकित -विस्मित उन्हें अपने कैमरे की परिधि में समोते रहे, आँखों में उनकी छवियों को संजोते रहे और अंततः समय की सीमा के कारण अतृप्त ही बाहर आने को विवश हुए इसके नियंता-निर्माता नृपतियों की काव्यमय परिकल्पना एवं इसके शिल्पकारों के अद्भुत कलाकौशल को यादों में सँजोये| स्वप्नलोक के जैसा इस महालय का परिवेश किसी क्लासिकी महाकविता के पाठ जैसा लगा मुझे| कई स्थानों पर अज्ञेय की कालजयी रचना 'असाध्य वीणा' के अंश मेरे मन में रूपायित होते रहे| लगा जैसे उस दारुवीणा से उपजे संगीत की कई मुरकियाँ ही वहाँ के भवनों के प्रस्तर-खंडों में उग आई हों| चित्रमयता थाईलैंड के शिल्प की सबसे विशिष्ट पहचान मुझे लगी| वास्तव में थाई शिल्प पुरातन भारतीय, चीनी एवं ख्मेर शिल्प के सम्मिश्रण से उपजा है और उसका अपना एक मनोरम स्वरूप इस राजमहल के विभिन्न भवनों में देखने को मिलता है| इस महान महल के तीन प्रमुख हिस्से हैं - पहला भाग, जिसे बाह्य खंड कहा जाता है, प्रमुख रूप से अपने 'एमरल्ड' यानी पन्ना-बुद्ध मन्दिर की भव्यता के कारण विश्व-प्रसिद्ध है| इसी खंड में राजभवन के कार्यालय भी स्थित हैं| दूसरा खंड है मुख्य राजकीय आवासों का, जिसकी शिल्प-सजावट किसी अप्सरा-अभिसारिका के रत्न-जड़ित आभरणों और आभूषणों की शोभा को भी लज्जित करती सी लगती है| और अंतिम खंड है रनिवास का| वह भी द्वित्तीय खंड की तरह ही विविध शिल्पाकृतियों  से सजा हुआ है| ऊंचे उठे हुए त्रिकोणीय शिखरों के कारण इन सभी भवनों की शोभा देखते ही बनती है| चीनी वेशभूषा में चोबदारों की शिल्पाकृतियाँ जगह-जगह खड़ी दिखाई देती हैं बाद के इन दोनों खंडों में| इन्हीं खंडों में स्थित है अष्ट 'प्रांग' यानी आठ महाचेदियाँ, जो अलग-अलग रंगों में भगवान बुद्ध के जीवन, स्वरूपों और उनकी शिक्षाओं का द्योतन करती हैं| ये महाचेदियाँ दूसरे खंड में बनी हुई हैं| इसी खंड में कंबोडिया के अंगकोर वाट के विश्व-प्रसिद्ध प्राचीन विष्णु मन्दिर की प्रतिकृति भी बनी हुई हैप्रथम एवं द्वितीय खंड का निर्माण राजा राम प्रथम के समय में हुआ और तृतीय खंड का निर्माण राजा राम तृतीय के शासन काल में कराया गया| इस प्रकार यह राजभवन इस राजवंश की महान गौरवगाथा का प्रतीक है| राजभवन से निकलकर बाहर आने पर मैं एक ओर इसके किसी कल्पना-रूपक जैसे परिवेश से अभिभूत था तो दूसरी ओर यह भी सोच रहा था कि यह भी भारत के ताजमहल के समान ही किसी सम्राट के स्वप्न से उपजा है, पर इसे रूपाकार देने वाले शिल्पकार एवं कलाकार  कौन थे, यह प्रश्न  न तो कोई पूछता है और न ही जान पायेगा| वे अनाम शिल्पी काल के कराल गाल में पता नहीं कहाँ बिला गये| राजकीय कोष से जो धन-सम्पदा इन भवनों के निर्माण में लगी होगी, उसे कितने-कितने प्रजाजनों की भूख-प्यास ने भरा होगा| वस्तुतः यही तो है इतिहास का महाप्रश्न| मनुष्य की तमाम सौन्दर्य-उपलब्धियों के पीछे निष्ठुर शोषण का निर्मम इतिहास छिपा है, इसमें  कोई संदेह नहीं है| इस विरोधाभास की परिणति कई बार विद्रोह एवं क्रांति में भी होती है, जिनमें सौन्दर्य के ये महा-प्रतीक नष्ट-भ्रष्ट भी हो जाते हैं| किन्तु सौन्दर्य के निर्माण और उसके विनाश की इस प्रक्रिया में आमजन की इच्छा-अनिच्छा का कोई मूल्य नहीं होता| यही सबसे बड़ी मानुषी विडम्बना है| इतिहास के
नियामक और निर्माता आमजन तो नहीं होते| आज भी स्थिति वही है| आज के तथाकथित प्रजातांत्रिक विश्व परिवेश में भी आमजन की नीति-निर्धारण और विकास की दिशा आदि के निर्देशन में भूमिका नगण्य ही है|        

महालय के परिसर से हम बाहर आ गये हैं| हमारे सभी सहयात्रियों को एक अनूठी उपलब्धि का अहसास है| दिन के तीन बज चुके हैं और सुबह का नाश्ता अब तक उदर में समाप्त हो चुका है| जठराग्नि कह रही है कि उसे फिर से आहुति दी जाये| माइक ने सलाह दी है कि हम स्थानीय चाटुचक सप्ताहांत  मार्केट चले जाएँ, जो टूरिस्टों में विशेष प्रिय है  | वहाँ भोजन की व्यवस्था भी हो जाएगी| वहाँ जाने को हमारे समूह के सभी युवा सदस्य समुत्सुक हैं - वहाँ से खरीदारी करने का मोह सभी के मन में है| बस हम पति-पत्नी इसके लिए बहुत उत्साहित नहीं हैं| एक कारण तो यह कि बुढ़ापे के कारण हम थक जल्दी जाते हैं और अब थक चुके हैं, दूसरे यह कि अब बहुत सामान इकट्ठा करने का हमारे मनों में उत्साह भी नहीं रह गया है| बच्चों को वहीँ बाहर से कुछ छुटपुट भोज्य-सामग्री खरीदकर खिलाने के उपरांत अंततः हम ऑटोरिक्शों से, जिन्हें यहाँ की स्थानीय भाषा में 'टुकटुक' कहा जाता है, चाटुचक मार्केट की ओर चल पड़े हैं|                     
     
    
इस बहु-चर्चित मार्केट का हमारा यह 'विजिट' बेकार ही रहा| उसमें ऐसा हमें कुछ भी नहीं मिला या दिखाई दिया, जिसे खरीदकर हमें लगता कि हाँ, यह हमारे देश से अलग की चीज है और इसे पाकर हम यहाँ की यादों को सँजो सकेंगे| वह एक बहुत ही गुंजान और तंग गलियों वाला इलाका था और काफी भीड़भाड़ के कारण उसमें से गुजरना भी मुश्किल था| मार्केट में चीजें तो तमाम किसिम की उपलब्ध थीं, किन्तु वहाँ का पूरा माहौल एक निम्न-वर्गीय समुदाय के उपयुक्त ही लगा मुझे| लखनऊ के मुख्य मध्यवर्गीय अमीनाबाद के मार्केट में स्थित 'गड़बड़झाला' की याद मुझे बरबस ही वहाँ आती रही | और जहाँ तक खाना खाने का प्रश्न था, उसकी उपलब्धि तो वहाँ न के बराबर थी| थोड़ी बहुत बच्चों ने खरीदारी की और हम वहाँ से निराश और थके-माँदे अपने होटल शाम छः बजे तक वापस आ गये|  होटल के पास स्थित मॉल में बच्चे गये, पर हम दोनों ने अपनी थकन मिटाने के लिए कमरे में ही रहना उचित समझा| राहुल हमारे लिए भोजन वहीँ ले आये और इस प्रकार हमारे थाईलैंड भ्रमण का वह पहला सत्र समाप्त हुआ|



२०.०६.२०११ 
आज की हमारी यात्रा है क्वाए नदी के तट पर स्थित कंचनाबुरी ( संस्कृत कंचनपुरी ) नगरी की ओर| बैंकाक के राजधानी महानगर से लगभग सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित कंचनाबुरी आज एक व्यवसायिक नगर है - संभवतः पहले भी यह क्षेत्र थाईलैंड का एक समृद्ध स्थान रहा होगा, तभी इसको कंचनपुरी नाम दिया गया होगा| क्वाए नदी की धारा को विभाजित करके एक विस्तृत नैसर्गिक-लगती नहर-व्यवस्था का निर्माण किया गया है, जिसमें बनाया गया है आज का प्रसिद्ध 'फ्लोटिंग मार्केट'| वहीं पर स्थित है 'टाइगर टेम्पल', जहाँ बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पाले गये चीतों की शरणस्थली है| वस्तुतः इसे 'टेम्पल' न कहकर एक 'टाइगर रिज़र्व' कहना अधिक तर्कसंगत होगा|  

इस पूरी यात्रा में हमें थाईलैंड के खूब हरे-भरे समृद्ध ग्राम्य-परिवेश से परिचित होने का अवसर मिला| पूरे रास्ते में मार्ग के दोनों ओर नारियल वृक्षों के घने निकुंज हमें दीखते रहे| थाईलैंड पर प्रकृति की विशेष कृपा का भान इस यात्रा-पथ में हमें बार-बार होता रहा| कंचनाबुरी से कुछ किलोमीटर पहले स्थित अम्मोवाई कस्बे में हम थोड़ी देर के लिए ठहरे हैं| यहाँ हमने नारियल के गुड़ को बनते देखा| हाँ, उसे चखा भी| खूब मीठा -बिलकुल बंगाल के खजूर के गुड़ जैसा, किन्तु रंगत में उससे अलग| नारियल में इतनी मिठास होती है कि उसका गुड़ बनाया जा सके, यह हमने पहली बार जाना|

'फ्लोटिंग मार्केट' में मोटर बोट पर बैठकर मार्केट की परिक्रमा करने का हमारा अनुभव मेरे लिए अत्यंत सुखद रहा| पानी पर विचरती नाव और दोनों ओर किनारों पर स्थित प्रकृति की सुरम्य गोद में पसरे घर और हाट - सच में, यह अनुभव अद्भुत रहा मेरे लिए| इटली का वेनिस शहर देखा तो नहीं है, पर शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक 'मर्चेंट ऑफ वेनिस' के सन्दर्भ में उसके विषय में जानने का काफी कुछ मौका मिला था  विद्यार्थी काल में और बाद में प्राध्यापक के रूप में उसे छात्रों को पढ़ाते समय कल्पना में उसे पता नहीं कितनी बार मैंने चित्रित भी किया था| 'डिस्कवरी' चैनेल पर उसकी छवियों को देखा भी था| 'फ्लोटिंग मार्केट' में घूमते हुए वही कल्पना और उसकी सम्मोहक छवियाँ जैसे जाग्रत होने लगीं| रास्ते भर छोटी-बड़ी नौका-दूकानें, घरों के बाहर लट्ठों पर टँगी नावें पूरे वातावरण को एक सागरीय रंगत दे रही थीं| मुख्य बाज़ार में हम उतरे भी - वहाँ हम सबने कुछ छुटपुट खरीदारी भी की| पूरे तौर पर यह अनुभव सुखद रहा

दोपहर बीत रही थी और हमें भूख लगने लगी थी| हमने वहाँ से थोड़ी दूर पर ही क्वाए नदी की मुख्य धारा में स्थित एक फ्लोटिंग रेस्टोरेंट-होटल में स्थानीय थाई भोजन का आनन्द लिया| हमने 'वेजिटेरियन' खाद्य-पदार्थ लिए - सब्जी और चावल| चावल थाई लोगों का प्रमुख भोजन है| सब्जियाँ भी वे हल्की पकी हुई और कम वसा एवं मसालों वाली ही खाते हैं| हम भारतीयों के लिए वह भोजन बिल्कुल अलग किसिम का, किन्तु हमें वह अस्वाद नहीं लगा| क्वाए एक बड़ी नदी है और उस पर तैरते उस भोजनालय का वातावरण हमें बड़ा ही रमणीय लगा| भोजनोपरांत जिस वाश बेसिन में हमने हाथ-मुँह धोया, उसे देखकर मैं चकित रह गया| वह पूरा-का-पूरा लकड़ी का यानी जंगल-वुड का ही बना हुआ था| ऐसा वाशबेसिन हमने तो पहली बार ही देखा था| वहां के चित्रमय वातावरण में हमारा मन खूब रमा|     

क्वाए नदी एक बड़ी नदी है और उसे देखते-देखते मेरे मन में युवा काल की एक सुखद स्मृति जाग गई| द्वितीय विश्वयुद्ध की एक ऐतिहासिक घटना पर आधारित उस जमाने की अत्यंत प्रसिद्ध अंग्रेजी फिल्म 'ब्रिज ऑन दी रिवर क्वाए' की अचानक याद ताज़ा हो आई| उसे देखे एक पूरी अर्द्धशती बीत चुकी थी, किन्तु क्वाए नदी के उस महा-विस्तार को देखकर उसके तमाम दृश्य मेरे दृष्टि-पटल पर अनायास ही उभर आये | मैं उस स्थल को देखने को उत्सुक हो उठा,जहाँ वह ऐतिहासिक घटना घटी थी| माइक से मैंने उसके बारे में पूछा, तो उसने बताया कि वहाँ जाने से पूर्व हम 'टाइगर टेंपल' जायेंगे

'टाइगर टेंपल' नाम से मेरे मन में कल के देखे हुए-से किसी भव्य मन्दिर की छवि साकार होने लगी, किन्तु वहाँ जाकर और उसे देखकर पता चला कि वह वस्तुतः एक 'टाइगर रिजर्व' है, जिसमें बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पाले हुए बाघों के साथ सैलानियों के मनोरंजन की व्यवस्था की गयी थी| उस पहाड़ी ऊबड़-खाबड़ घाटी का पूरा परिदृश्य एकदम प्राकृतिक था| आधुनिक सभ्यता से परे उस स्थान का अपना ही एक अलग किसिम का प्रभाव पड़ा मेरे मन पर | वहाँ अन्य वन प्राणी यथा बारहसिंघे, हिरण और शुतुरमुर्ग भी उन्मुक्त विचरण कर रहे थे|  पहले तो यह देखकर हमें बड़ा आश्चर्य हुआ, फिर बाद में जब हमने बाघों को लोहे की जंजीरों से बँधा देखा, तब हमें इस रहस्य का पता चला कि बौद्ध भिक्षुओं द्वारा रचे इस पर्यटक स्थल की असलियत क्या है| दोपहर बाद के उस समय में जंजीरों से बँधे अलसाये बाघों के समीप जाकर उन्हें छूने के अपने पराक्रम को कैमरे में कैद करने की सभी सैलानियों में होड़ लगी हुई थी| मुझे छोडकर हमारे ग्रुप के भी सभी सदस्यों ने इस अनुभव को स्थायी बनाया| सरला भी चकित, कुछ-कुछ सहमी हुई तीन बाघों को छूकर वापस आ गईं| मेरे मन में न तो ऐसा करने की कोई इच्छा जागी और न ही कोई उपलब्धि की अनुभूति| भय का भी कोई अहसास मेरे मन में नहीं था, हालाँकि हो सकता है मेरे संगी-साथियों को ऐसा लगा हो| सारे ही बाघ इस सारे नाटक से अनजान अलस तटस्थ लेटे हुए थे| कुछ की तो आँखें भी मुँदी हुईं थीं| कुछ बीच-बीच में कुछ पलों के लिए आँखें खोलकर अधमुँदी दृष्टि से अपने इन पराक्रमी दर्शकों को देख लेते थे और फिर अपनी अलस अर्द्धसुप्तावस्था में खो जाते थे| एक बाघ जो सबसे बड़ा था, कुछ पलों बाद जब जाग्रत होकर लौह-श्रंखलाओं से जकड़ा बेचैनी से परिक्रमा करने लगा, तो उसके पास जाकर उसे छूने के लिए किसी भी पर्यटक को नहीं ले जाया गया| इसी से उस मिथक को विराम मिल गया कि वहाँ बाघ बौद्ध भिक्षुओं के तप के प्रभाव से शांत रहते हैं| मनुष्य की अन्य जीवों के प्रति इस मनोरंजन-दृष्टि को मैं कभी भी सही ढंग से नहीं समझ पाया| वन के इन मुक्त जीवों का मनुष्य द्वारा यह शोषण मेरी समझ से हमेशा ही परे रहां है| खैर, वहाँ से निकलते हुए माइक से मैंने पूछा कि क्या वहाँ कोई मन्दिर भी है| उसने कहा - नहीं, यहाँ बौद्ध भिक्षुओं के तप के प्रभाव से शांत हुए बाघों के स्थल होने के कारण ही उसे 'टाइगर टेंपल' का नाम दिया गया है| बुद्ध की जीव मात्र के लिए करुणा की परिणति उनके ही अनुयाइयों के हाथों इस प्रकार के व्यवसायीकरण में होगी, इसका ज़रा भी भान संभवतः उन्हें नहीं रहा होगा| वहाँ के एकदम  आदिम परिवेश को छोड़कर  मुझे उस स्थान से अन्य कुछ भी यादगार रखने लायक अनुभव नहीं मिला- शक्ति और ऊर्जा से भरे वन्य पशुओं को निरीह-अलस बनाने का वह प्रयास तो कतई ही नहीं|  

और... अब हमारे आज के भ्रमण का अंतिम पड़ाव - मेरे युवाकाल के फिल्म-अनुभव से जुड़ा और मेरे मन में वर्षों से बसा क्वाए नदी का द्वितीय विश्वयुद्ध के समय का रेलवे पुल| पुल पर से गुजरते हुए फिल्म में देखी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित अनगिनत  छवियाँ एकाएक उभरने लगीं| आज यह एक पर्यटन-स्थल है और उसकी ऐतिहासिकता को सुरक्षित रखने के लिए एक संग्रहालय का भी निर्माण यहाँ किया गया है, जिसमें उस युद्ध के समय उपयोग की गई युद्ध सामग्री और पुल के निर्माण के लिए इस्तेमाल किये गये फावड़े -कुदाल आदि औजारों और कार, रेलवे के डिब्बों आदि को रखा गया है| पुराने समय का वह लोको रेल इंजन भी संग्रहालय में प्रवेश करते ही हमें दिखा, जिसका उपयोग जापानी सेना ने उस समय के बर्मा ( आज के म्यानमार ) देश में प्रवेश करने के लिए किया था|  उस समय के जापान के हाथों युद्धबंदी बनाये गये अमेरिकी सैनिकों की सीमेंट में बनी पुल-निर्माण करती मूर्तियाँ बनाकर जापानी सेना के द्वारा उनके क्रूर एवं त्रासक शोषण को भी रूपायित किया गया है इस संग्रहालय में| फिल्म में बाद में इन्हीं अमेरिकी सैनिकों ने इस पुल को विध्वंस कर जापानी सेना के आगे बढ़ते कदमों को रोकने का निष्फल प्रयास भी किया था| आज के रेलवे पुल से नदी के उस पार स्थित एक भव्य आधुनिक बौद्ध विहार का विहंगम दृश्य और उसमें विशाल श्वेत खड़ी बुद्ध प्रतिमा को और नीचे दीखते बोट-रेस्तराओं की कतार को देखना भी एक सुखद अनुभव रहा| क्वाए नदी का यह तट-प्रदेश बहुत ही हरा-भरा और मनोरम है| हमारा मन वहाँ से हटने का तो नहीं कर रहा था, फिर भी शाम के बढ़ते सायों को देखकर और बैंकाक की वापसी यात्रा में कम-से-कम तीन घंटे लगने की बात सोचकर हम वापस अपनी वैन में जा बैठे|                       

                                                             
२१.०६.२०११ 
सुबह हम अपनी दिनचर्या के मुताबिक जल्दी ही उठ गये हैं| हमारी 'बॉडी क्लाक' हमें बहुत देर तक सोने नहीं देती| आज की हमारी पहली भ्रमण-स्थली है बैंकाक नगर से थोड़ी ही दूर पर स्थित वहाँ का प्रसिद्ध जंगल सफारी पार्क'| रास्ते में हम देखते रहे बैंकाक के एकदम साफ-सुथरे और चिकने महामार्ग बैंकाक एक्सप्रेस वे को, जो इस राजधानी नगर को थाईलैंड के सभी अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थलों एवं नगरों से जोड़ता है| वैसे तो थाईलैंड पूरा-का-पूरा काफी हरा-भरा है बिलकुल हमारे केरल और बंगाल की तरह, किन्तु 'सफारी पार्क' में प्रवेश करते ही हमें लगा जैसे कि हम हरीतिमा के एक स्वर्ग में ही आ गये हैं| वृक्षों-गाछों-विभिन्न प्रकार के झाड़ों से परिवेष्टित इस मिनी जंगल में थाई परियोजकों द्वारा एक सुंदर पशु-उद्यान का निर्माण किया गया है|            

प्रवेश-द्वार से थोड़ी दूर पर ही स्थित है वह खुला प्रेक्षागार जिसमें हमारे पहुँचते ही हमें ओरांगटाँग शो देखने जाना है| हमारे पहुँचते-पहुँचते शो शुरू हो चुका था| पूरा स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था| लगभग आधे घंटे चले उस शो में कुशल प्रशिक्षित ओरांगटाँगों के द्वारा किसिम किसिम के मनोरंजक खेल प्रस्तुत किये गये| ओरांगटाँग बुद्धि में मनुष्य के सबसे नज़दीकी जीव माने जाते हैं और उनके द्वारा प्रदर्शित करतब भी किसी सर्कस के जोकरों की तरह के थे| हमारे साथ के बच्चों का उससे अच्छा मनोरंजन हुआ| हमारी पोती पाँच साल की काश्वी तो खूब हँसी ऊनके तमाशे देखकर| वहाँ से निकलते ही एक अन्य स्टेडियम में हमने सी-लायन्स की क्रीड़ाएँ देखीं| वहाँ भी प्रशिक्षण का कौशल कमाल का था| आधे घंटे की उनकी विविध जल-थल की क्रीड़ाओं ने हमारा भरपूर मनोरंजन किया| और उसके तुरंत बाद एक अन्य क्रीड़ांगन में हमने 'हालीवुड काउब्वाय स्टंट शो देखा| उसे देखकर कम-से-कम मुझे तो घोर निराशा हुई| एक निम्न स्तर की हालीवुड काउब्वाय फिल्म की भोंडी नकल लगी वह आधे घंटे की प्रस्तुति| इन प्रदर्शनों को और कुछ पशुओं के बाड़ों को देखते दोपहर हो चली थी| दोपहर १२.००  बजे से १.०० बजे तक लंच का समय था| हमने सफारी के ही विशाल भोजनागार में भारतीय भोजन लिया और फिर माइक के निर्देशानुसार लगभग ढाई बजे शुरू होने वाले डालफिन शो वाले प्रेक्षागार की दिशा में बढ़ चले| उस शो के शुरू होने में अभी डेढ़ घंटे का  समय था और हम आराम से रास्ते के 'बर्ड  पार्क' और अन्य पशु-उद्यानों को देखते रहे| पक्षी-विहार में कई नये किसिम के पक्षी हमें देखने को मिले| एक खुले पक्षी-प्रांगण में रंग-बिरंगे तोतों के साथ उन्हें दाना खिलाते हुए फोटो खिंचाने का अनुभव बड़ा ही मनोरंजक रहा| राहुल, विवेक, सोमेन्द्र जी, ह्रदय, मोनिका, दीपाली और हमारे साथ के चारों बच्चों ने उस क्रीडा का भरपूर आनन्द लिया| उसके बाद के हमारे रास्ते में ही पड़े कई पशु-बाड़े, जिनमें सफेद शेर, दरियाई घोड़े, सील मछलियों आदि के पिंजड़े हमारे लिए विशेष आकर्षण के रहे| एक नया पशु हमें वहाँ देखने को मिला, जिसका नाम था 'तापिर' -वह देखने में एक छोटे भालू जैसा ही था, पर उसकी नाक बहुत लंबी और आगे की तरफ हाथी की नाक की तरह झुकी हुई और लटकी हुई थी| एक बात जो इस पशु-उद्यान में भ्रमण करते हुए मुझे बार-बार आकर्षित करती रही -वह थी उसका खूब हरा-भरा प्राकृतिक परिवेश और सभी पशुओं के लिए विचरण की समुचित व्यवस्था - साथ ही दर्शकों के लिए भी ऐसी दीर्घाएँ, जहाँ से वे बिना खतरनाक पशुओं के निकट जाए उनका भली-भाँति अवलोकन कर सकें| मुझे तो ऐसा ही लगता रहा कि मैं एक जंगल में ही भ्रमण कर रहा हूँ| एक कल्पना मेरे मन में जागी कि कहीं मैं ईसाइयों के धर्मग्रन्थ 'बाइबिल' में वर्णित 'ईडन' के गार्डेन में ही तो नहीं पहुँच गया हूँ| कहते हैं कि प्रभु द्वारा निर्मित अदन के  उस वन में वसंत ऋतु सदैव ही बनी रहती थी और वह स्वयमेव हरा-भरा एवं फल-फूलों से संपन्न रहता था - हाँ, वैसा ही निसर्ग का विपुल वैभव, वैसी ही वानस्पतिक संपन्नता| मैं थोड़ी देर के लिए अकेले बैठा उसी नैसर्गिक संपन्नता पर मंत्रमुग्ध होता रहा, जब मेरे अन्य सहयात्री अन्य स्थलों के अवलोकन के लिए आगे बढ़ गये| जहाँ पर मैं बैठा हुआ था, वह एक बाँसवृक्षों का बड़ा ही सुंदर निकुंज था और मैं उस एकांत में बैठा उस स्थान की चित्रमयता पर मंत्रमुग्ध होता रहा

और... अब समय हो गया था 'डालफिन शो' का| उस स्टेडियम में पहुँचने में हमें थोड़ी देर हो गयी और बड़ी मुश्किल से हमें बैठने का स्थान मिल पाया| डालफिन मछलियों की वे विविध क्रीड़ाएँ भी मनुष्य के प्रशिक्षण कौशल और मनुष्येतर जीवों की बुद्धिमत्ता की ही बानगी देती रहीं पूरे पौन घंटे के उस शो में| डालफिन मछलियों को मैंने खुले समुद्र में छलाँगें लगाते देखा था, पर यहाँ की उनकी क्रीड़ाएँ ऊनके प्रशिक्षकों के कौशल से प्रेरित थीं और बिलकुल निकट से हमें देखने को मिल रहीं थीं| हर क्रीडा के उपरांत उन्हें पुरस्कार स्वरूप उनकी मनचाही छोटी मछलियों का भोजन मिल जाता था और वे तुरंत अगली क्रीडा के लिए अपने प्रशिक्षक के इशारे पर दौड़ पडती थीं| ऐसा ही मैंने 'सी-लायन' वाले शो में भी देखा था| प्रशिक्षण त्रुटि-रहित था, इसमें कोई संदेह नहीं है| पर एक विचार मेरे मन को बार-बार परेशान करता रहा कि इस कौशल को सीखने में इन जलजीवों को अपनी नैसर्गिक क्षमताएँ तो कहीं नहीं गँवानी पड़ी हैं | उनकी स्वतन्त्रता का अपहरण तो इससे होता ही है| मनुष्य की अतिरिक्त बुद्धिमत्ता का मूल्य अन्य जीवों को कितना चुकाना पड़ा है, यह एक चिन्तन का विषय है| मनुष्य के असंयमित-असंतुलित स्वार्थ से उपजे अन्य जीवों के इस शोषण के कारण ही तो कई जीव-जातियाँ आज समाप्ति की कगार पर हैं और केवल जन्तुगृहों में शेष रह गयी हैं| मनुष्य के द्वारा समूचे जीव-जगत का व्यवसायिक उपयोग भी मेरी समझ से परे रहा है| एक ओर है मनुष्य का अपरिमेय दुर्धर्ष बुद्धि-कौशल, जिससे उसने इस धरती को अपने रहने योग्य ही नहीं बनाया, बल्कि उसे अपने सौन्दर्यबोध से रमणीय भी बनाया है और दूसरी ओर उसके लोभ-मोह, जिससे उसने पता नहीं कितने अनाचार रचे हैं| 'सफारी वर्ल्ड' से निकलते हुए मेरा मन इसी प्रकार के विचारों से
उद्वेलित हो रहा था

और ... अब सफारी पार्क के उस हिस्से की ओर, जिसे 'जंगल क्रूज़' कहा जाता है| पैंतालीस मिनट की आठ किलोमीटर की बंद गाड़ी के इस सफर में हम जीव-जन्तुओं के तथाकथित प्राकृतिक परिवेश से परिचित हुए| शीशे की बंद खिड़की के पार दिखते हिरण-बारहसिंगों-जेब्रा-जिराफों के झुण्ड के झुण्ड,और उसके बाद वर्जित-सुरक्षित क्षेत्र में वनराज शेर बड़ी संख्या में उपस्थिति , किन्तु यहाँ भी मनुष्य की परियोजना दृष्टि का प्रभाव स्पष्ट दीखता हुआ| उनके लिए बने नकली गुहाशरणस्थल और 'शेड' आदि उनके दासत्व की गवाही दे रहे थेफिर भी हम सब के लिए यह अनुभव काफी रोमांचक रहा| अपराह्न के उस अलस समय में सभी जीव या तो सुस्ता रहे थे या फिर इधर से उधर बहुत ही धीमी गति से आ-जा रहे थे| जंगल के राजा सिंह की दहाड़ हमें यहाँ भी सुनने को नहीं मिली, हालाँकि हम उनके बिलकुल पास से होकर गुज़रे| वे तटस्थ बैठे या लेटे हमारी उपस्थिति से अनजान ही बने रहे| हम उस घुमक्कड़ी के बाद की आत्म-तुष्टि से भरे अंततः शाम होते-होते वापस अपने होटल की ओर लौट चले| रस्ते में हम बैंकाक के प्रसिद्ध 'इन्द्रा मार्केट' में थोड़ी देर के लिए रुके| वह एक कई-मंजिला मॉल की तरह का मध्यवर्गीय बड़ा हाट है, पर उसमें भटकने और चीजें खरीदने में हम दोनों पति-पत्नी की कोई रूचि नहीं थी, अस्तु हमने वापस होटल जाना ही उचित समझा| सोमेन्द्र जी भी हम लोगों के साथ होटल वापस आ गयेबाकी अन्य सदस्य वहाँ रुक गये, किन्तु वे भी उस मार्केट से जल्दी ही वापस आ गये| उस दिन की हमारी यात्रा काफी मनोरंजक एवं अनुभव-समृद्ध रही और हमें बैंकाक नगर की पर्यटन-विशेषताओं का भी उससे पता चला| मैं रात में सोते समय बार-बार यह सोचता रहा कि हम अपने देश की पर्यटन-समृद्धि को क्यों नहीं इसी प्रकार 'शो-केस' कर पाए|        

२२. ०६. २०११ 
माइक हम लोगों से कल शाम विदा ले चुका था| आज हमें थाईलैंड की पुरानी राजधानी अयूथया या अयुध्या  जाना था और वहाँ हम स्वयं ही घूम सकते थे| होटल वालों से पूछकर एक नई टैक्सी-वैन का प्रबंध कर लिया गया था, जिसका ड्राइवर वहाँ का जानकार था और कुछ जानकारियाँ राहुल-मोनिका आदि को भी थी इंटरनेट के माध्यम से|अयूथया बैंकाक से उत्तर में लगभग ८५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और वहाँ पहुँचने में हमें करीब डेढ़ घंटे लगे| अयूथ्या' संस्कृत-हिदी 'अयोध्या' का ही थाई रूपांतरण है और संभवतः पुरातन हिन्दू प्रभाव का द्योतक है| कभी एशिया के सुदूर पूर्व के देशों में हिन्दू व्यापारियों का आना-जाना एक आम बात थी और उसी दौरान कुछ राजवंशियों का भी आना हुआ होगा, जिन्होंने यहाँ अपनी राज्य-सत्ता संभवतः स्थापित कर ली होगी| उन्हीं के वंशजों ने 'राम' की उपाधि लेकर यहाँ हिन्दू राजवंश और अयूथ्या नगरी की स्थापना की होगी| इंटरमीडियट में पढ़े वृन्दावनलाल वर्मा जी के प्रसिद्ध नाटक 'पूर्व की ओर' की याद हम दोनों पति-पत्नी को हो आई| ऐसे ही प्रसंग पर आधरित है वह नाटक, जिसमें पल्लव वंश के एक राजपुत्र के देश-निष्कासन के बाद पूर्व के एक द्वीप ( सुमात्रा या जावा द्वीप ) पर पहुँचकर वहाँ राज्य-स्थापना का कथानक रचा गया था| कम्बोडिया के अंगकोर वाट का विष्णु मन्दिर तो आज भी इस प्रकार के भारतीय हिन्दू राजवंशों के उन प्रदेशों में आगमन की गवाही दे रहा है| मध्यकाल में पूरे सुदूर पूर्व एशिया के द्वीपों में इस तरह के हिन्दू- बौद्ध राज्यों की स्थापना हुई होगी| बौद्ध धर्म के भारतेतर एशियाई देशों में प्रचार-प्रसार की एक गौरवपूर्ण गाथा तो है ही| आज हम उसी यहाँ के शासक राम के वंश की राजधानी की ओर जा रहे थे, जो मूलतः तो हिन्दू रहे होंगे पर बाद में बौद्ध धर्मावलंबी हो गये होंगे - हाँ, थाईलैंड की अयोध्या को देखने| मेरा मन उत्कंठित हो रहा है यह सोचकर कि संभवतः वहाँ हम हिन्दू प्रभाव के अवशेषों को देख पायेंगे| वैसे शाक्य कुल भी सूर्यवंशी ही था और इस नाते बुद्ध भी भगवान राम की वंश-परंपरा में ही आते हैं| विष्णु के नवें एवं अंतिम अवतार के र्रूप में उनकी मान्यता के पीछे भी राजनीति के अलावा संभवतः उनके इस खानदानी जुड़ाव का भी विचार रहा होगा|      

एक राज्य के रूप में अयूथया का चार सदियों से ऊपर का एक लंबा गौरवपूर्ण  इतिहास है|   इस राज्य की स्थापना ईस्वी सन १३५०-५१ में राजा रामाथिबोदी प्रथम ने की थी| पन्द्रहवीं शताब्दी के अंत तक अंगकोर की विजय के साथ यह एक साम्राज्य का रूप धारण कर चुका था| वस्तुतः इस राज्य-शासन का स्वरूप भारत के चक्रवर्ती साम्राज्यों की तरह का था, जिसमें दिग्विजयी सम्राट के अधीनस्थ राज्य करद राज्यों की तरह एक प्रकार से शासन-व्यवस्था आदि में स्वतंत्र होते थे| इसके पूर्व के बड़े थाई राज्य सुखोथाई ( १२३८ -१४३८ ) १३७८ ईस्वी में ही यों तो अयूथया राज्य का करद राज्य बन चुका था, किन्तु १४३८ में अयूथया के राजा बोरोम्माराचा द्वितीय और उसकी राजरानी, जो सुखोथाई राजवंश की कन्या थी, की सन्तान रामेसुअन के दोनों राज्यों के संयुक्त राजा के रूप में सिंहासनासीन होने पर उसका पूरा विलय अयूथया राज्य में हो गयाअयूथया एक समृद्ध राज्य था उसके व्यापारिक संबंध भारत, चीन, जापान, वियतनाम आदि  पड़ोसी एशियाई देशों के अतिरिक्त योरोप के फ़्रांस, हालैंड, पुर्तगाल और स्पेन तक से थे| राजा नरई ( १६५६-१६८८ ) के फ़्रांस के राजा लुई चौदहवें से सीधे संबंध थे| उस समय यों तो विदेशी इसे स्याम राज्य के नाम से जानते थे, पर यहाँ के वासी अपने को 'ताई' और अपने देश को 'ताई देश' कहते थे| आज का 'थाईलैंड' उसी ऐतिहासिक 'ताई' अस्मिता का द्योतक है| इस राज्य का राजकीय धर्म बौद्ध मत का थेरावाद रहा था, पर बौद्ध महायान पन्थ के अनुयायी भी यहाँ काफी संख्या में थे| बर्मा से इसका बराबर ही विरोध रहा और अंततः इसका पतन भी बर्मी आक्रमण के कारण ही हुआ| सन १७६५ में ५०,००० बर्मी सैनिकों की विशाल सेना के साथ युद्ध में अयूथया का राज्य पराजित हो गया और राजधानी अयुध्या को बर्मी सेना ने सन १७६७ में जलाकर भस्म कर दिया, जिसमें उनकी संपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर - बहुमूल्य कलाकृतियाँ, पुरालेखागार एवं समृद्ध पुस्तकागार आदि - पूरी तरह नष्ट हो गयी| यूनेस्को द्वारा ऐतिहासिक विश्व-धरोहर घोषित हुए पुरानी अयूथया के खण्डहर उस महासंहार की गाथा आज भी कहते हैं| इस प्रकार का सांस्कृतिक महानाश विश्व के हर देश को किसी-न-किसी कालखंड में झेलना पड़ा है| मानव जाति का समूचा इतिहास इस प्रकार के नरसंहारों एवं विनाशों से भरा पड़ा है| आज भी इस मनोवृत्ति में कोई अंतर नहीं आया है| अफगानिस्तान में बामियान बुद्ध की मूर्तियों को खंडित करने का काण्ड बहुत पुराना नहीं है|  

हम अयूथया में सबसे पहले राजा प्रसार्त थोंग द्वारा सत्रहवीं शताब्दी में चाओ फ्राया नदी में स्थित बंग पा-इन द्वीप पर निर्मित कराए गये 'बंग पा-इन राजमहल' देखने गये| इसे 'समर पैलेस' भी कहा जाता है| इस महल का निर्माण किसी समय सत्रहवीं शताब्दी में कराया गया था|  अपनी माँ की स्मृति में उसने पहले इस द्वीप पर 'वाट चुम्फोंन निकायरम' नामके एक मठ और फिर एक सरोवर का निर्माण कर मठ की दक्षिण दिशा में 'ऐसवान-धिपाया-असना' ( संभवतः  संस्कृत में ऐसावन दिव्य आसन ) नामक पहले राजभवन का निर्माण उसने अपने पुत्र ( भविष्य के प्रतापी राजा नराई ) के जन्म के वर्ष  ईस्वी सन १६३२ में करवाया| यह निश्चित नहीं है कि इस राजमहल का उपयोग सन १७६७ में अयूथया के पतन के समय हो रहा था या नहीं| किन्तु १८०७ में जब राज्य के सर्वश्रेष्ठ कवि सुनथोन फु ने इस स्थान को देखा तो उसके अनुसार यह एक उपेक्षित स्थान था और इसके आसपास जंगल उग आया था| बाद में चक्री वंश के राजा राम चतुर्थ ( १८५१-१८६८ ) ने, जिसे राजा मोंग्कुट के नाम से ज्यादा जाना जाता है, बाहरी द्वीप पर एक अस्थायी आवास का निर्माण करवाया, जिसे बाद में उसके पुत्र राजा चुलालोंग्कोर्ण यानी राजा राम पंचम ने नव-गोथिक शैली के वर्तमान 'वाट निवेत थम्प्रावत' नामक मठ का रूप दिया| उसी के राज्यकाल में १८७२ से १८८९ के बीच में आज की जितनी भी इमारतें यहाँ हैं, उनका निर्माण हुआ| यानी यह राजमहल एक प्रकार से आधुनिक काल में निर्मित हुआ और इसके स्थापत्य पर पाश्चात्य भवन-निर्माण शैली का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है| महल-भवनों में जो फर्नीचर आदि लगा है और जो उनकी साज-सज्जा है, वे सभी योरोपियन ढंग के ही है|

इस भवन में प्रवेश करते ही हमें वहाँ कुछ 'टुकटुक' यानी ऑटोरिक्शा खड़े दिखाई दिए, जिन पर सवार होकर सारे भवनों आदि की सैर की जा सकती थी, किन्तु हमने पैदल ही घूमना अधिक उचित समझा, क्योंकि हम अपनी इच्छानुसार इस पूरे सुंदर महल-परिसर को देखना चाहते थे| चारों और जलाशयों से घिरी या उनके तट पर स्थित इन सुंदर इमारतों ने हमारा मन मोह लिया| हर तरफ करीने से कटी हुई घास के बड़े-बड़े मैदान और शांत खुला वातावरण - मेरे कवि-मन के लिए एक बहुत ही प्रेरक मनोरम स्थान! प्रारंभ में ही एक साफ-सुथरी नहर के किनारे स्थित है 'हो हेम मोन्तिएन देवराज' यानी ख्मेर शैली के प्रासाद की तरह निर्मित देवराज इंद्र का मन्दिर| मन्दिर बहुत ही छोटा, पर उसके स्थापत्य ने बंगाल के मठों, मन्दिरों की याद मेरे मन में ताज़ा कर दी| मन्दिर के शिखर पर इंद्र के वज्र की आकृति  बनी हुई थीमहर्षि दधीचि के अपनी अस्थियों के महादान की कथा बहुत बचपन से हमने सुनी-पढ़ी थी| मनुष्य के तपस में कैसी महाशक्ति और ऊर्जा भरी रही होगी कि असुरों से युद्ध करने में अक्षम हुए सभी देवास्त्रों से अधिक शक्तिशाली वह साधारण-सा अस्त्र साबित हुआ| वही अस्त्र देवराज के उस मन्दिर के शिखर पर विराजमान था| मैं कुछ देर के लिए मानुषी आस्था-आस्तिकता के उस महा-प्रतीक के चिन्तन-मनन में व्यस्त हो गया|                                                   
             
राजभवन के बाहरी परिसर में स्थित इस मन्दिर के अतिरिक्त तीन और मुख्य भवन भी हैं| वे हैं 'सबाकर्ण राजप्रयून' यानी राजसंबंधियों के लिए सभागार| जैसा इसके नाम से ही आभास होता है, इस दो-मंजिला भवन की संरचना १८७६ में राजा चुलालोंग्कोर्ण द्वारा अपने भाइयों के आवास के रूप में की गई थी| आज इस भवन का उपयोग बंग पा-इन महामहल के प्रदर्शनी भवन के रूप में किया जाता है| दूसरा भवन है      ‘ऐसावान-धिपाया-असना'  जिसका अर्थ होता है  व्यक्तिगत मुक्ति का दैवी आसन| इस थाई शैली के  भवन का निर्माण सन १८७६ में राजा चुलालोंग्कोर्ण ने एक बाहरी ताल के बीच में  करवाया था| यह उसके पिता राजा मोंग्कुट द्वारा बनवाये 'फ्रा थिनांग अफोन्फिमक प्रसात' की अनुकृति है|  और तीसरा है 'फ्रा थिनांग वरोभास बिमार्न' आवासीय महाकक्ष, जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ एवं ज्योतिर्मय स्वर्गिक आवास| यह आवास नव-क्लासिकी शैली का एक-मंजिला महल है, जिसे राजा चुलालोंग्कोर्ण ने १८७६ में बनवाया था|

अंदर का महल-परिसर यानी अन्तःपुर के भाग को बाहरी परिसर से एक जाली से ढँकी हुई दीवार वाले पुल से जोड़ा गया है| इसमें आवास करने वाली रनिवास की महिलाएँ उस जाली के माध्यम से बाहर की घटनाओं को बखूबी देख सकती थीं, पर उन्हें कोई देख नहीं सकता था| यह पुल वरोभास बिमार्न भवन को 'देवराज कुंलाई' अर्थात देवराज निर्गमन द्वार से जोड़ता है, जो अन्तःपुर के कक्षों में प्रवेश करने का मुख्य मार्ग है| अंदर के परिसर में उद्यानों के बीच में  आवासीय भवन एवं खुले मंडप आदि बनाये गये हैं| राजा चुलालोंग्कोर्ण को उद्यान विशेष प्रिय थे, इसलिए इस भाग में सुंदर उद्यान-भवनों की संरचना देखने को मिलती है| इसका मुख्य भवन है'उदयान फुमिसथियन' आवास महाकक्ष यानी पवित्र भूमि का उद्यान|  यह उद्यान भवन राजा को विशेष प्रिय था और वर्ष में कम-से-कम तीन बार तो वह इस भवन में आवास करने के लिए राजधानी से अवश्य पधारता था| सन १९३८ में यह सुंदर भवन मरम्मत के दौरान एक अग्नि-दुर्घटना में जलकर नष्ट हो गया था और सन १९९६ में महारानी सिरिकित ( संस्कृत श्रीकीर्ति ) के आदेश से इसका पुनर्निर्माण कराया गया| इस महल के अतिरिक्त इस परिसर में एक चीनी शैली का सुंदर महल है, जिसे चीनी वाणिज्य संघ ने राजा चुलालोंग्कोर्ण को भेंट-स्वरूप दिया था और इसके बारे में कहा जाता है कि इसके जैसा वैभवपूर्ण महल चीनी सम्राट के पास भी नहीं था| इसके अतिरिक्त इसी परिसर में  राजा चुलालोंग्कोर्ण द्वारा ही १८८१ में निर्मित करवाई हुई एक बेधशाला भी है| हमने उस मीनारनुमा बेधशाला के ऊपर चढ़कर उस रमणीय महल-परिसर के अवलोकन का आनन्द लिया| इस अन्तःपुर में बहुत सी पाश्चात्य स्थापत्य शैली के भवन हैं, जो बाद के पाश्चात्य प्रभाव के द्योतक हैं| इसके अतिरिक्त इसी परिसर में दो स्मारक भी हैं - एक है रानी सुनन्दाकुमारीरत्ना की समाधि  , जिसकी मृत्यु  बंग पा-इन महल आते समय चाओ फ्राया नदी में डूबने से हो गयी थी और दूसरी है राजकुमारी सओवाभार्क नारिरत्ना और राजा चुलालोंग्कोर्ण की तीन संतानों के देहावसान पर उसके द्वारा निर्मित समाधि| बंग पा-इन राजमहल के इस भ्रमण ने मेरे सौन्दर्य- बोध को एक नया आयाम दिया| सुंदर साफ-सुथरे परिसर ने मुझे जैसे सम्मोहित ही कर दिया| वहाँ से चलने का मन तो नहीं कर रहा था, पर हमारे अयूथया आने का मुख्य उद्देश्य तो वहाँ के उस प्राचीन भवन एवं मन्दिर परिसर को देखना था, जिसे विश्व धरोहर ऐतिहासिक पार्क के रूप में संरक्षित किया गया है| सो हम अपने अगले पड़ाव यानी उसी ऐतिहासिक स्मारक-स्थल की ओर चल दिए|

पुराने अयूथया के खण्डहरों में पहुँचकर हमें लगा कि जैसे हम इस धरा से परे के किसी पुरालोक में आ गये हों | छोटी लखौरी ईंटों से निर्मित महल एवं मन्दिर उस विनाश की गाथा कह रहे थे, जो आज से लगभग साढ़े चार सौ साल पहले यहाँ घटित हुआ था| बुद्ध की तमाम खंडित प्रतिमाएँ मनुष्य की हिंसक अमानुषी वृत्तियों की गवाही दे रही थीं| कभी यह पूरा इलाका स्वर्णकांति मूर्तियों और दीपाधारों में जगमगाते स्वर्ण-दीपों की जोत से स्वर्ग से भी अनुपम लगता रहा होगा| मुख्य पुरातत्त्व-स्थल में प्रवेश करते ही हमें शयन करती भगवान बुद्ध की श्वेत पौलिश की हुई विशाल प्रतिमा के दर्शन हुए| उस पर तमाम सुनहरे चमकीले कागज़ की बिंदियाँ चिपकी हुईं थीं| शरीर तो एक चमकीले रेशमी पीत वस्त्र से ढंका हुआ था, इसलिए पता नहीं चल पाया कि उस पर कितनी बिंदियाँ चिपकी हुईं थीं या उनके चिपकने के कितने भद्दे निशान थे, पर बुद्ध भगवान के परम भक्तों ने अपने अन्धविश्वास के जो चिह्न उनके चेहरे पर छोड़े थे, उन्हें देखकर हम दोनों पति-पत्नी को तो बड़ी ग्लानि हुई| मनुष्य अपनी स्वार्थ-कामनाओं की सिद्धि के लिए अपनी श्रद्धा से उपजे देव-स्वरूपों को भी कितना विरूप बना सकता है, इसकी गवाही दे रहा था महाबुद्ध की उस विशाल मूर्ति का चेहरा| बड़ी दयनीय लगी भगवान की वह मुखाकृति|                             
                                                       
अंदर के प्रांगण  में सामने ही एक पुराना किन्तु नवीन साज-सज्जा से युक्त मंडप हमें मिला| इसमें स्थापित मूर्ति, सुनते हैं, काफी पुरानी है, पर उसकी स्वर्ण-पट्टिकाओं से ढँकी आभा तो मुझे आज की ही लगी| देवता कोई भी हों, उनके नाम पर व्यवसाय करने की प्रवृत्ति उतनी ही पुरानी है, जितना मनुष्य के द्वारा निर्मित उनके देवालय| अयूथया का यह तथाकथित प्राचीन मन्दिर भी इसका अपवाद नहीं है| भारत में पुराने देव-मन्दिर तो सदैव ही इस प्रकार के आडंबरों के साक्षी रहे हैं, नए-नए संतों-महात्माओं-फकीरों के साधना एवं समाधिस्थल भी इस प्रवृत्ति के शिकार होने से नहीं बच पाए हैं| शिरडी के फक्कड़ साधू महान संत साईँ बाबा की साधना-स्थली इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है| चाहे वह मुसलमानों का काबा हो या हिदुओं की काशी या ईसाइयों का वैटिकन हो या सिक्खों का स्वर्ण मन्दिर - सभी जगह मनुष्य की धार्मिक आस्था की विकृति के ही दर्शन होते हैं| वैसी ही अनुभूति इस बुद्ध-मन्दिर में आकर मुझे हुई| मन्दिर के अंदर ही सुनहरी चमकीली धातु से बनी बुद्ध-प्रतिमाओं का विक्रय चल रहा था|

इस मंडप के पीछे ही है वह विशाल प्राचीन बुद्ध मन्दिर, जिसे विश्व धरोहर ऐतिहासिक स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है| उसके परिक्रमा-परिसर में चारों ओर पत्थर की सुखासीन बुद्धप्रतिमाएँ बनी हुईं है, जिन पर रेशमी पीत दुकूल पड़े हुए थे| उस खंडित मन्दिर का गर्भ-स्थान काफी ऊँचाई पर बना हुआ है| वहाँ से पूरे उस ऐतिहासिक स्थल का जो  मनोरम विहंगम दृश्य देखने को मिला, वह अनुपमेय था|'फ्रा चेदि चाया मोंकोल' नामक उस स्तूपाकार चेदि-मन्दिर में एक प्राचीन बुद्ध-प्रतिमा स्थापित तो है, पर मुझे नहीं लगा कि उसकी पूजा-अर्चना की जाती होगी| कम-से-कम उस अपराह्न की बेला में तो उसके कोई चिह्न नहीं दिखाई दिए| उसके सीढ़ी-मार्ग के दोनों ओर दो विशाल बुद्ध-प्रतिमाएँ बनी हुई हैं, जिन पर रेशमी पीतवर्ण वस्त्र पड़े हुए थे| लगता था कि थोड़े दिनों पूर्व ही वहाँ कोई बृहत आयोजन संपन्न हुआ था| बाहर लगी पुरातत्त्व विभाग की पट्टिका से पता लगा कि उस मन्दिर-परिसर का निर्माण अयूथया के प्रतापी राजा नरेसुअन ने सन १५९२ में बर्मा के उस काल के राजा के आक्रमण के समय निर्णायक रूप से अपनी विजय के स्मारक के रूप में करवाया था| बर्मा और थाईलैंड के अयूथया राज्य के बीच हुए युद्धों,बर्मा के स्याम देश यानी  थाईलैंड पर आक्रमणों का सदियों का इतिहास है, जिसकी अंतिम नियति ईस्वी सन १७६७ में अयूथया राज्य के पराभव और इस प्राचीन राजधानी के नष्ट होने में हुई| विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित इस ऐतिहासिक नगरी का वैभव खण्डहरों में आज भी देखने को मिलता है| वास्तव में यह एक विशाल खण्डहर-नगर है, जिसमें तमाम बुद्ध-मन्दिरों एवं बौद्ध विहारों के अवशेष बिखरे पड़े हैंतीन कालखंडों में पुरातत्त्व-विशेषज्ञों द्वारा इन खंडहर-अवशेषों को विभाजित किया गया है| वे हैं प्रारंभिक यानी पूर्वकालिक, बीच के यानी मध्यकालिक एवं बाद के यानी अर्वाचीन| उनमें से विशेष दर्शनीय हैं प्रारंभिक काल के वाट महाथत, जिसमें एक वटवृक्ष में भगवान बुद्ध की किसी प्राचीन प्रतिमा का शिरोभाग  स्थापित है एवं वाट रत्चाबुराना, जिसमें एक बहुत ही सुंदर एवं मनमोहक बुद्ध-प्रांग है, मध्यकाल के वाट फ्रा सम्फेट, जिसमें तीन बड़ी चेदियाँ हैं  एवं वाट चा मोंग्कोल, जहाँ की चेदि भी प्रसिद्ध है और बाद का वाट चाई वात्तानारम, जिसके प्रांग और स्तंभ दर्शनीय हैं| समकालीन वाट फानन चोएंग बुद्ध की एक प्राचीन प्रतिमा के कारण जाना जाता है| और जो स्थल देखने योग्य हैं उनमें प्रमुख हैं वाट फुत्थाई सावन, वाट फ्रा राम, वाट चोएंग था, वाट सुवन  धरम, वाट मोंग्खोन बोफित आदि| इनके अतिरिक्त वाट थम्मिकारत, वाट कसत्त्राथिरत, वाट फुखाओ थोंग, वाट सोम, वाट माहेयोंग को भी, यदि समय हो, तो देखा जाना चाहिए| प्राचीन अयूथया नगरी के इन अवशेषों के बीच से गुजरते हुए मुझे बार-बार एक सिहरन होती रही यह सोचकर कि मनुष्य के सारे अहंकारों की यही नियति है और साथ ही यह अहसास भी कि काल सबसे बली है और उसके सामने हमारी सारी सिद्धियाँ, सारी उपलब्धियां निरर्थक सिद्ध  हो जाती हैं|                                  

                              
अयूथया के अन्य आकर्षणों में बैंकाक की तरह का ही एक फ्लोटिंग मार्केट और एक एलीफैंट फार्म है| एलीफैंट फार्म ने तो हमें निराश किया| फ्लोटिंग मार्केट में सभी ने थोड़ी-बहुत खरीदारी की और फिर हम
बैंकाक वापसी की यात्रा पर निकल पड़े| रास्ते में एक और बौद्ध मन्दिर हमें दिखा| थके होने के कारण पहले तो हम सबने उसे न देखने की सोची, पर फिर पता नहीं किस प्रेरणा से हम उसे देखने चले ही गये| बाहर से मन्दिर इतना आकर्षक नहीं लग रहा था, किन्तु अंदर प्रवेश करने पर हम उसकी भव्यता और सौन्दर्य पर मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह सके| ऊंची वेदी पर स्थित विशाल स्वर्णजटित बुद्ध प्रतिमा के चारों और स्थापित तमाम छोटी-बड़ी स्वर्णिम बुद्ध-प्रतिमाओं की आभा से अंदर का पूरा वातावरण एकदम अतीन्द्रिय लग रहा था| हम सम्मोहित उस सौन्दर्य को निरखते- अपने कैमरों में सँजोते रहे| वहाँ के रक्षकों एवं कार्यकर्ताओं से पूछने पर उसका नाम जानने की हमारी जिज्ञासा का समाधान नहीं हो पाया, क्योंकि वे सभी थाई भाषा के अतिरिक्त कोई अन्य भाषा बोल-समझ नहीं सकते थे| हमारे सौभाग्य से उसी समय एक युवक ने मन्दिर के परिसर में प्रवेश किया,जो पढ़ा-लिखा लग रहा था| उसने मन्दिर का नाम 'वाट पेनान्चर्ग' बताया| 'पेनान्चर्ग' शब्द का अर्थ वह भी नहीं बता पाया| उसने यही बताया कि शायद वह किसी का व्यक्तिगत नाम है| खैर जो भी हो, उस मन्दिर से निकलते हुए हमें एक अजीब किसिम की उपलब्धि का अहसास हो रहा था| अयूथया की हमारी यात्रा का यही अंतिम पड़ाव था और हमें लगा कि जैसे हमारी यात्रा का समापन किसी तीर्थ के दर्शन में हुआ है|  

देर शाम हम बैंकाक पहुँचे| हम दोनों पति-पत्नी तो इतना थक चुके थे कि हमारी हिम्मत कहीं जाने की नहीं हो रही थी| फिर भी चाय आदि पीकर यह निर्णय लिया गया कि आज नजदीक के मार्केट में जाकर भारतीय भोजन लिया जाये| हम दोनों को छोड़कर अन्य सभी एक दिन पहले भी वहाँ जाकर भोजन कर चुके थे| उस दिन राहुल हमारे लिए वहीं से खाना ले आये थे| किन्तु आज हिम्मत कम होने पर भी हम उनके साथ गये| होटल के मालिक एक सरदार जी थे| उस दिन हमारा ग्रुप ही उनके होटल में उपस्थित था, इसलिए सरदार जी हम लोगों से बतियाने खड़े हो गये| वे बड़ी साफ-सुथरी हिंदी बोल रहे थे| उत्सुकतावश सरला के उनसे पूछने पर कि वे कहाँ के रहनेवाले हैं, पता चला कि वे तो हमारे उत्तरप्रदेश के कानपुर नगर के ही वासी हैं| हमारी बहू मोनिका के पिता सोमेन्द्र जी भी एक प्रकार से कानपुर के ही वासी हैं| मोनिका से बात करते-करते सरदार जी तो उसके मौसाजी के परिवार के पड़ोसी एवं घनिष्ठ जानकार निकले| वे उनके सभी भाई-बहनों को काफी नजदीक से जानते थे| एक-एक का नाम लेकर उन्होंने सब के बारे में पूछताछ की| वे काफी प्रसन्न दिखे इस पुरानी यादों के झरोखे के खुल जाने से| हमें भी ऐसा लगा जैसे कि हम किसी निकट के व्यक्ति से मिल रहे हों | मेरे लिए यह अनुभव काफी रोचक रहा| मैं बाद में सोचता रहा कि कैसे-कैसे संयोग कई बार उपस्थित हो जाते हैं| एक सुदूर देश में आत्मीयता का यह प्रसंग, सच में, सुखद था कम-से-कम मेरे लिए - चकित करने वाला भी| यह इत्तिफाक था या नियति द्वारा पूर्व-नियोजित, यह प्रश्न मेरे मन में उस रात सोते समय काफी देर तक घूमता रहा|                               

२३. ०६. २०११ 
बैंकाक का हमारा भ्रमण पूरा हुआ और आज हम चल पड़े हैं दो दिनों के लिए समुद्र-तटीय नगर पट्ट्या की ओर| बैंकोक से वहाँ जाते समय एक स्थान पर मैंने पट्ट्या के स्थान पर 'फथया' भी लिखा देखा| जो भी हो पट्ट्या यानी संस्कृत के 'पट्टिका' या हिंदी के 'पटिया' शब्दों एवं संस्कृत के ही 'पथ' शब्द से इसका गहरा नाता मुझे लगा| बैंकाक से दक्षिण में थाईलैंड खाड़ी के पूर्वी हिस्से में बैंकाक से लगभग १६० किलोमीटर दूर  स्थित यह नगर अपने मनोरम समुद्र तटों, अपने हरे-भरे परिवेश एवं आधुनिक सुख-सुविधाओं से युक्त होटलों, अपनी 'नाईट लाइफ' और नई किसिम की मार्केट-सुविधाओं के कारण पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है | वहाँ हम लगभग १२.३० बजे पहुँचकर अपने गन्तव्य होटल आइबिस में थोड़ी देर रुके और फिर सायं होने तक समुद्र-तट पर घूमने के लिए चले गये| उस दिन थाई ढंग का खाना हमने होटल आइबिस में ही लिया | उस दिन एक ही और कार्यक्रम हमारा था और वह था निकट ही स्थित हाल में '’टिफेनीज़ शो' देखने का| वहाँ जाने से पूर्व हमारे विशुद्ध सनातनी संस्कारी मन में शंका थी कि हम अपने बेटे-बहू और उनके बच्चों के साथ क्या उस आधुनिक शो को देख पायेंगे, किन्तु हमारी वह शंका निर्मूल निकली| कहते हैं कि यह शो पिछले सैंतीस वर्षों से लगातार पट्ट्या में चल रहा है और पट्ट्या के विशेष आकर्षणों में से यह एक है| ‘शो’, एक 'इंटरल्यूड'को छोड़कर, जिसमें थोड़ी अभद्रता थी, पूरी तरह  स्वस्थ एवं मनोरंजक था और इतना सधा हुआ और आकर्षक भी कि एक भी क्षण के लिए इधर-उधर सोचने की फुर्सत न मिले| सभी देशों के आकर्षक नृत्यों का उसमें समायोजन किया गया था, जिनमें भारतीय शास्त्रीय नृत्य भी शामिल था| प्रस्तुति इतनी सुष्ठ और सौन्दर्यपूर्ण कि मन में संगीत की मुरकियाँ फूटने लगें| हाल में प्रवेश से पूर्व बाहर उस शो के लिए आमन्त्रण देतीं आकर्षक वेशभूषा में नृत्यांगनाओं को देखकर मुझे इंद्रसभा की अप्सराओं की बरबस याद आ गई| उनके साथ फोटो खिंचाने के लिए शो के लिए प्रतीक्षा करते दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ी हुई थी| हाँ, उन्हें देखकर मुझे अमृतलाल नागर के प्रसिद्ध उपन्यास 'शतरंज के मोहरे' में अवध के अंतिम बादशाह वाजिदअली शाह की 'इन्दरसभा' का जो वर्णन किया है, उसकी भी बरबस ही याद हो आई| साढ़े नौ बजे से सवा दस बजे तक चले पौन घंटे के उस प्रोग्राम ने हम सब को पूरे समय ऐसा बाँधकर रखा कि उसके समाप्त होने पर लगा कि अभी और चलता| और हम वहाँ से बाहर निकलते समय उसकी प्रशंसा किये बगैर नहीं रह पाए| लगा कि जैसे हम किसी जादूनगरी से निकलकर आये हैंरात में सोते समय भी मेरे मन में वे नृत्य-छवियाँ तैरती रहीं|                

२४. ०६. २०११ 
आज पूरे दिन समुद्र-यात्रा का कार्यक्रम - हम सुबह जल्दी ही तैयार होकर निकटवर्ती 'सी बीच रोड' पर पहुँच गये हैं| हमारा होटल समुद्र-तट से बहुत नजदीक है| अस्तु, हमने अपनी टैक्सी को नहीं बुलवाया| पैदल ही वहाँ पहुँच गये| हमारे साथ के छोटे बच्चों को भी कोई असुविधा नहीं हुई| वहाँ पहुँचकर हमने तट पर ही खड़ी एक युवा महिला 'गाइड' से संपर्क किया और शीघ्र ही एक मोटरबोट पर सागर-संतरण के लिए चल पड़े| लगभग दस-बारह मिनट लहरों के आरोहों-अवरोहों के बीच हिंडोले लेते हम बीच समुद्र में एक फ्लोटिंग प्लैटफार्म पर जा पहुँचे, जहाँ 'पैरा-सेलिंग' की व्यवस्था थी| वहाँ लगभग आधे घंटे के समय में राहुल, हृदय, शाश्वत एवं अभिन्न ने पैरा-सेलिंग का आनन्द लिया| हर पैरा-सेलर को समय तो दो-तीन मिनट का ही मिला, पर प्रतीक्षा की लंबी पंक्ति के कारण इतना समय लगा| शाश्वत और अभिन्न के अभी छोटे होने के कारण उनके साथ पैरा-कर्मचारी भी लटककर गये| उन्हें पैराशूट से लटके समुद्र के तल के ऊपर हवा में तैरते देखने का दृश्य हमारे लिए रोचक और रोमांचक दोनों ही रहा| उसके बाद की हमारी यात्रा कोरल आइलैंड की ओर रही| किन्तु तट से थोडा पहले ही एक मोटर-लांच पर हमें चढ़ाया गया अंडर-सी वाकिंग के ऐडवेंचर के लिए| दो लांच एक साथ जोड़ दिए गये थे और उन पर सी-वाकिंग के इच्छुक पर्यटकों की और उनके परिजनों की भीड़ थी| सी-वाकिंग के लिए तो राहुल और हृदय ही गये और उस दस-पन्द्रह मिनट के समय में हम सभी नीचे के सागर-तल में स्थित कोरल और अन्य सागर-वनस्पतियों का अवलोकन करने के लिए एक पारदर्शी तल वाली नौका में बैठ गये| किन्तु हमें निराशा ही हाथ लगी, क्योंकि उससे जो कुछ हमें दिखा,वह न तो बहुत स्पष्ट था और न ही रोचक| आधी-अधूरी उन छवियों से हमारा न तो ज्ञान-वर्धन हुआ और न ही मनोरंजन| ख़ैर, चलो एक अनुभव तो हुआ और यह पता भी चला कि पर्यटकों को ठगने के कितने-कितने तरीके खोजे गये हैं| यदि हम न जाते तो शायद यही सोचते रहते कि उस अनुभव से हम वंचित रह गये| मनुष्य का स्वभाव भी बड़ा विचित्र है| जो उसे प्राप्त होता है, उससे वह संतुष्ट नहीं होता और जो उसे नहीं प्राप्त होता, उसके प्रति ललक और उत्कंठा से भरा रहता है| कोरल आइलैंड का समुद्र-तट विशेष दूर नहीं था और हमें वहाँ अपनी निश्चित बोट से पहुँचने में मुश्किल से तीन-चार मिनट का समय लगा| उसकी पहाड़ियाँ तो काफी दूर से ही यानी पट्ट्या के सी-बीच से भी दिखाई दे रही थीं

कोरल आइलैंड यानी इस मूंगा-द्वीप की 'बीच' काफी विस्तृत रेतीली है और सैलानियों के तैरने एवं रेस्ट करने आदि के लिए यहाँ विस्तृत प्रबंध किये गये हैं| मैं भी थोड़ी दूर तक अठखेलियाँ करतीं लहरों के बीच चलने का आनन्द लेने सभी के साथ गया, फिर लौट आया जहाँ सरला बैठी हुईं थीं और अन्य सभी साथियों को समुद्र की उछलती -गिरती लहरों के बीच क्रीड़ा करते देखता रहा| कोरल आइलैंड में हमें कोरल या मूँगा के होने का कोई प्रमाण नहीं मिला और हमें लगा कि यह भी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया एक मिथक है| वहाँ लगभग दो घंटे रहने के बाद हम वापस लौट पड़े| लौटते समय लहरों के आवेग के साथ उछलती बोट के आन्दोलन को मैं चुप बैठा महसूस करता रहा| अन्य सभी भी यात्रा और क्रीड़ा की थकन के कारण चुप थे| शायद वे भी लहरों में नौका की उछल-कूद का अनुभव कर रहे थे| मुंबई में एलिफैन्टा गुफाओं की यात्रा का-सा कुछ-कुछ अनुभव था, पर यहाँ समुद्र अधिक खुला और इसी कारण अधिक चंचल लगा| बौंबे हाई में बने पोतों के लिए स्थायी प्लैटफार्मों और कई पोतों के लंगर डाले खड़े होने के कारण वहाँ जल का वेग और लहरों के आलोड़न उतने नहीं हैं, जितने यहाँ हमें महसूस हो रहे थे| फिर एलीफैन्टा बड़े लांच ही आम तौर पर जाते हैं, जिन्हें लहरें उतना विचलित नहीं कर पातीं| हाँ, गोवा में अवश्य ही कुछ-कुछ ऐसा ही अनुभव हमें हुआ था, पर वह यात्रा इसके मुकाबले में काफी छोटी थी| अन्य समुद्रों की मैंने यात्रा नहीं की है| मेरे लिए तो यह बोट की लहरों पर उछल-कूद बिल्कुल नई थी| हम सबको सेफ्टी जैकेट पहना दी गयी थी| वैसे तो समुद्र शांत था, पर उतने खुले सपाट समुद्र में जल को उछलते-कूदते देखने का अनुभव नया ही था मेरे लिए|  

हम लगभग तीन बजे पट्ट्या की बीच पर उतर गये| वहीँ हम दोनों और मोनिका-राहुल-शाश्वत-काश्वी और मोनिका की मम्मी और विवेक ने सामने ही एक भारतीय होटल में खाना खाया - अन्य लोगों ने होटल आइबिस में भोजन लिया| इस बीच हमने अपनी टैक्सी को बुला लिया था, क्योंकि 'अंडरवाटर वर्ल्ड', जिसे देखने का हमारा कार्यक्रम था, हमारे होटल से काफी दूर था| 'अंडरवाटर वर्ल्ड' है तो एक कृत्रिम निर्मित समुद्री जीव-जन्तुओं का विहार-स्थल, किन्तु उसका संयोजन हम लोगों के द्वारा मुंबई आदि स्थानों पर देखे साधारण 'अक्वेरियम' से बिल्कुल अलग किसिम का था| पारदर्शी गुफा-मार्ग से गुज़रते हुए अपने आस-पास और ऊपर विभिन्न छोटे-बड़े जल-जन्तुओं को तैरते देखने का वह अनुभव,सच में, बड़ा रोमांचक और आनन्ददायी रहा| उस जल-जन्तु संग्रहालय में प्रवेश करने के बाद ऐसा ही महसूस होता है जैसे कि आप समुद्र-तल में ही यात्रा कर रहे हों| बच्चों को तो बड़ा ही आनन्द आया| उनकी चकर-मकर ताकती अचरज से भरी नजरें और चहकती आवाजों से उनके आनन्द का पता चल रहा था| निकास-मार्ग पर एक मछलियों का उसी तरह का शो चल रहा था, जैसा कि हम बैंकाक में जंगल वर्ल्ड में देख आये थे| निकास द्वार एक स्टोर-कम-शॉप से होकर था, जिसमें उस अंडरवाटर वर्ल्ड के जीव-जन्तुओं की खिलौना-प्रतिकृतियाँ सेल के लिए रखीं थीं| बच्चों को लुभाने के लिए की गयी इस व्यवसायिक चतुराई की प्रशंसा मन-ही-मन करने को मैं विवश हो गया| बच्चों के लिए उनके माता-पिता ने कुछ-न-कुछ खरीदा ही

और अब होटल की ओर वापसी| हम बड़े कुछ लोग तो अपने-अपने कमरों में अपने थके शरीरों को आराम देने लगे, जबकि हमारे समूह के युवा सदस्य पट्ट्या नगर के मार्केट, यहाँ के मॉल आदि में घूमने-फिरने, कुछ खरीद-फरोख्त करने के लिए चले गये| गई-रात वे लोग लौटे|

२५.०६.२०११ 
आज हमारा कोई प्रोग्राम नहीं है, सिवाय बैंकाक वापस जाकर हवाई अड्डे से थाईलैंड के समयानुसार साढ़े-सात बजे की अपने देश भारत वापसी की फ्लाईट पकड़ने के, पर होटल से हमें साढ़े-दस बजे चेक-आउट कर जाना है| सामान आदि नीचे लाकर उसे टैक्सी में जमाने में थोडा टाइम लगा और फिर हम पट्ट्या
नगर की एक परिक्रमा पर निकल पड़े| हम सी-बीच सड़क के उस हिस्से से होकर निकले जिसके बारे में बताया गया था कि रात के दस बजे के बाद उस पर कार आदि सवारियों की मनाही हो जाती है और वह 'नो-ट्रैफिक ज़ोन'  हो जाता है| वहीँ केन्द्रित है पट्ट्या की बहु-चर्चित 'नाईट लाइफ'| पिछली रात में विवेक ने उस सड़क का निरीक्षण किया था और देर रात तक होती वहाँ की गतिविधियों को देखा था| मैंने आज सुबह समुद्र के रात के ज्वार के बाद की तटीय रेती पर सीपी-घोंघों-मरी मछलियों के अतिरिक्त बीयर कैन और किसिम-किसिम के पाउच, प्लास्टिक के लिफाफे और फूलों के गज़रे भी पड़े देखे थे, जो छुपे तौर पर उस तट पर या उसके आसपास हुई गतिविधियों की गवाही दे रहे थे| वहाँ से लौटकर कमरे में आकर मैंने उससे उपजे भाव को कविता-बद्ध भी किया था| वह कविता इस प्रकार है -                          


देखो, सजनी 
तट पर सागर फेंक गया है 
           सीपी-घोंघे-मरी मछलियाँ 

बियरकैन-प्लास्टिक के पाउच
सभ्य समय का कूड़ा-करकट 
दिन भर इसने सहा उपद्रव 
रहा रात भर लेता करवट 

दूर कहीं से 
बहकर आये सड़े नारियल 
 किसिम-किसिम की झड़ी पत्तियाँ

इधर पड़ा है गजरा कुचला 
किसी पाप की गाथा कहता 
उधर खड़ी चट्टान अकेली 
सागर उसके नीचे बहता 

देश-देश के 
सैलानी आते इस तट पर 
     करने केवल मौज-मस्तियाँ 

खाड़ी के उस दूर सिरे पर 
मीनारों में जो कुछ होता 
उसे देखकर रोज़ रात में 
सागर अपना आपा खोता 

सुबह-सुबह
आ गईं किनारे, देखो, कितनी 
       मोटर बोटें-लांच-किश्तियाँ 


उसी दिन इसी अनुभव-सन्दर्भ का किन्तु कुछ अलग किसिम की मनस्थिति का यह गीत भी उपजा - 

कुछ दिन पहले 
गीत मिला था
दूर देश के सागर तीरे  

चकित हुआ था 
देख वहाँ के हाट-लाट को 
पिकनिक वहाँ मनाने आये 
पर्यटकों के ठाठ-बाट को 

पॉप धुनों पर 
बजते देखे 
शंख-बाँसुरी-झाँझ-मंजीरे  

'पैरा-सेलिंग'
'अंडर सी वाकिंग' के खेले 
अधनंगे आदम-हव्वा के
देखे उसने कई झमेले 

टापू से 
लहरें टकराईं 
बिखरे तट पर अनगिन हीरे 

मन्दिर में देखी उसने 
सोने की मूरत
और हाट में मिली उसे 
बिकती जलपरियों की थी किस्मत 

चौंका पहले 
किन्तु रम गया 
उन खेलों में धीरे-धीरे 

पट्ट्या एक समुद्रतटीय पहाड़ी नगर है| उसकी चढ़ानों और ढलानों से गुजरते हुए मेरे मन में एक इच्छा उपजी कि काश मैं युवा हुआ होता और इस पहाड़ी क्षेत्र के सबसे ऊँचे बिंदु, जिसे ''वियु पॉइंट' का नाम दिया गया है, पर चढकर पूरे पट्ट्या नगर का विहंगम अवलोकन करता! पर्वतीय प्रदेशों की चढाई-उतराई मुझे हमेशा ही लुभाती रही है| संभवतः इसका कारण मेरा एक सपाट मैदानी इलाके में जन्म लेना और बाद में जीवन-भर एक अर्ध-मरुस्थलीय इलाके में निवास करना रहा है| पहाड़ों पर हर यात्रा नये-नये दृश्यों- छवियों से परिचित कराती है| और फिर यह पट्ट्या का इलाका, जहाँ समुद्र का खुला विस्तार और पर्वत की ऊँचाई एक-साथ उपस्थित है| एक भारतीय होटल में हमने भोजन लिया - वहाँ की अटेंडेंट एक थाई लडकी थी, किन्तु उस होटल में कई बरस नौकरी करने के कारण वह अच्छी-खासी हिंदी बोल रही थी| पट्ट्या में मोनिका ने जिस युवा गाइड लड़की को कल सायं भ्रमण के लिए साथ ले लिया था, वह हरियाणा के सिरसा जिले की रहनेवाली निकली, जो हमारे नगर हिसार से लगभग नब्बे किलोमीटर पच्छिम में स्थित है| उससे बातकर हमें एक अपनेपन का अहसास हुआ| थाईलैंड में भारतीय काफी बड़ी संख्या में बसे हुए हैं, यह कई मित्रों ने, जो यहाँ भ्रमण के लिए आ चुके थे, बताया था| उसके प्रमाण हमें यहाँ भी मिल गये

और अब ... वापस बैंकाक - हवाई अड्डे पर पहुँचते हमें लगभग चार बज गये और रिपोर्टिंग टाइम भी हो गया था| और फिर वापसी की उड़ान| इस बार भी हमारी सीटें विंग के पास ही थीं| अस्तु, नीचे के दृश्य आधे-अधूरे ही हमें दिखे| वैसे भी यान के छूटने के समय तक बाहर अँधेरा हो चुका था| भारतीय समय के अनुसार साढ़े दस बजे के कुछ बाद हमारा जहाज़ दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा और चेक-इन का सामान लेते, बाहर निकलते और घर पहुँचते आधी रात बीत चुकी थी और अगली यानी जून मास की छब्बीस तारीख शुरू हो चुकी थी|