Thursday, March 24, 2011

Naye Geet

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यही आज का समाचार है 


उठापटक के 
खेले चलते 
हुआ अखाड़ा सभागार है 
           यही आज का समाचार है 

दिन विपदा के परजा भुगते 
शाहों के घर बजें बधावे
रामराज घर-घर व्यापेगा-
रहे खोखले उनके दावे 

टका सेर के 
खाजे का 
परजा को अब भी इंतज़ार है 
            यही आज का समाचार है 


ठूंठ-हुए पीपल पर बैठी 
गौरइया के पंख जले हैं 
खबर सुर्ख़ियों में है आई 
बड़के राजा बड़े भले हैं 

उनके पाले 
गीधों ने 
उत्पात मचाया द्वार-द्वार है 
             यही आज का समाचार है 

नौटंकी में लँगड़ी नटिनी  
राज्यलक्ष्मी बनी रात कल 
कोख धरा की सूनी-बंजर 
फटा हुआ है माँ का आँचल

इन्द्रप्रस्थ की 
अप्सराओं के 
चेहरों पर अद्भुत निखार है 
             यही आज का समाचार है   




सुनें समाचार, बंधु



राजा के 
घर में है 
हर दिन त्योहार, बंधु 
         सुनें समाचार, बंधु 

विपदाएँ सारी ही 
परजा के भाग बदीं
राजा का दोष नहीं 
नदियाँ हैं कीच-लदीं 

चढ़ा प्रजा के 
सिर पर 
कर्ज़े का भार,बंधु   
      सुनें समाचार, बंधु 

रामराज रहा सिर्फ 
पुरखों के किस्से में 
आया वनवास सदा 
सीता के हिस्से में 

लक्ष्मण 
जा बसे -खबर 
हैं सागर-पार,बंधु
       सुनें समाचार, बंधु 

शहज़ादा  चतुर बड़ा 
गली-गाँव घूम रहा 
सबके घर भरें-पुरें 
उसने हर ज़गह कहा 

जहाँ गया 
वहीं सभी 
उजड़े घर-बार, बंधु 
        सुनें समाचार, बंधु 





  

गाँव-गली का समाचार है 


अख़बारों में 
नहीं मिलेगा 
गाँव-गली का समाचार है 

नदी-घाट पर 
साधू ने कल कथा सुनाई 
होरी के घर पोता जन्मा 
बजी नहीं ढोलक-शहनाई 

बाबा की बरसी का 
अब तक 
उसके सिर पर चढ़ा भार है  

खेत-पात गिरवी रक्खे हैं 
साहू के घर 
तेउरुस साल हुई थी बरखा 
हुआ अपाहिज ताल सूखकर 

सावन-भादों 
गये निर्जला 
सोच रहा सूखा कुआर है 

अबके संवत साथ पड़े थे 
ईद-दिवाली 
अहमद-रामू के घर की 
पर सूनी रहीं कटोरी-थाली  

धनिया के 
पिछले शुक्कर से 
खबर- चढ़ा म्यादी बुखार है 



जो अपराधी-ठग-लबार हैं  


जो अपराधी-ठग-लबार हैं 
                  बंधु, उन्हीं के
                     समाचार हैं 

हाट-लाट की मायानगरी 
उसमें खेले 
किसिम-किसिम के 
चकाचौंध हैं आँखें सबकी 
मंत्र जप रहे सब 
सिमसिम के 

जिनके सपने तक उधार हैं 
                   बंधु, उन्हीं के 
                      समाचार हैं 

इधर 'पेज थ्री' बना  सुर्खियाँ 
नये वक्त का ज़िक्र उसी में 
रिश्ते-नाते सारे नकली  
स्वारथ बसा सभी के जी में  

अंधे घोड़े पर सवार हैं 
                 बंधु, उन्हीं के 
                    समाचार हैं 

गाँव-जवार-गली की बातें 
सब पुरखों के संग सिधाईं 
सिंधु-पार के सपनों की ही 
घर-घर व्यापी है परछाईं 

करते दूजों का शिकार हैं 
                 बंधु, उन्हीं के 
                    समाचार हैं  












     
   

Sunday, March 20, 2011

Holi-geet

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रँग गुलाल के 
और फाग के बोल सुहाने 
बुनें इन्हीं से संवत्सर के ताने-बाने

ऋतु-प्रसंग यह मंगलमय हो 
हर प्रकार से
दूर रहें दुख-दर्द-दलिद्दर 
सदा द्वार से 

कभी किसी को 
कष्ट न दें जाने-अनजाने 

अग्नि-पर्व यह 
रंगपर्व यह सच्चा होवे 
पाप-ताप सब 
मन के-साँसों के यह धोवे 

हमें न व्यापें
कभी स्वार्थ के कोई बहाने

यह मौसम है 
राग-द्वेष के परे नेह का 
हाँ, विदेह होने का 
है यह पर्व देह का 

साँस हमारी
इस असली सुख को पहचाने  






Friday, March 18, 2011

Kuchh Gazalen

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ग़ज़ल 


एक घायल फाख्ता हमको मिला 
नीड़ भी उजड़ा हुआ हमको मिला

बहुत ढूँढ़ा हर तरफ बेकार ही  
दर्द सीने में छिपा हमको मिला 

पत्तियाँ उड़कर गईं किस ओर हैं 
यह हवाओं से पता हमको मिला 

आई जंगल की खबर अख़बार में
इधर बरगद काँपता हमको मिला 

रात-भर जाने कहाँ भटका है ये 
सुबह से सूरज थका हमको मिला 





ग़ज़ल 



धुएँ की मंजिल नहीं थी यह नदी तो 
कभी भी कातिल नहीं थी यह नदी तो 

खून से क्यों तर-ब-तर है धार इसकी 
युद्ध में शामिल नहीं थी यह नदी तो 

नाव इस पर कोई भी साबुत नहीं अब 
इस कदर बेदिल नहीं थी यह नदी तो 

खबर है कि नदी ज़हरीली हुई है 
नागिनों का बिल नहीं थी यह नदी तो 

पीढ़ियाँ आईं-गईं, पर आँसुओं से 
इस तरह बोझिल नहीं थी यह नदी तो 

ग़ज़ल 



कहाँ सपनों का है घर, देखिये तो 
ज़रा इस ओर आकर देखिये तो 

उमड़कर आ रहा जो चाँदनी में  
समुंदर को नज़र भर देखिये तो 

हज़ारों जले चाँदी के दिए हैं 
उधर पेड़ों के ऊपर, देखिये तो  
   
हँसी गूँजी किसी मेहरुन्निसा की  
इधर उड़ते कबूतर देखिये तो 

सुनहरे अक्स चारों ओर बिखरे
सुबह का है ये मंजर, देखिये तो    

किसी कान्हा की कलगी में लगा था 
गिरा यह मोर का पर, देखिये तो 

नहीं यह जिस्म, परियों की गुफा है 
हमें भी, यार, छूकर देखिये तो 





ग़ज़ल 



कल बात हुई घर में गीतों की किताबों की 
हाँ, महक भरी है फिर आँगन में गुलाबों की  

इस आइने को देखो, बेताब हो रहा  है 
यह बाट जोहता है कनखी के ज़वाबों की 

इंसान की है फितरत, वो ख्वाब में जीता है 
लंबी नहीं होती है यों उम्र शबाबों की  

हमने शहर है देखा, डूबा था तरन्नुम में 
सुर-ताल सभी उलटे, महफ़िल थी नवाबों की  

पलकों में हमारे है सपनों की नई सूरत 
फेहरिश्त है लंबी यों टूटे-हुए ख्वाबों की 




ग़ज़ल 


गीत पुराना उसने खत में ख़ास लिखा 
हमने भी कल आँसू का इतिहास लिखा  

करते भी क्या, कुछ-न-कुछ तो लिखना था 
दूर रहा जो, उसको भी था पास लिखा 

नदियों के सीने में आग सुलगती है 
हमने जलते जंगल में मधुमास लिखा 

इसी किनारे पर कल सूरज डूबा था 
यहीं हारकर हमने 'चाँद उदास' लिखा 

काले कोसों भटके हम, अब है जाना 
सबके मन में जीवन का विश्वास लिखा 

हँसी-ख़ुशी से भरा हुआ था राजभवन 
दरवाजे पर किसने यह 'वनवास' लिखा

सिन्धु-पार की आबोहवा लगी ऐसी 
हमने अपनी साँस-साँस पर 'प्यास' लिखा 

आखिर में हमने बच रहे हाशिये पर 
'बहुत पुरानी इस घर की बू-बास' लिखा 




ग़ज़ल 


हमें दिखा कल एक कबूतर जंगल में 
पहले भी थे बसे देवता जंगल में 

कुछ दिन पहले एक सुनहरा हिरन दिखा 
पत्ता-पत्ता मिला काँपता जंगल में 

जिसकी आँखों में करुणा का सागर था
वही मसीहा हुआ लापता जंगल में 

देखें बच्चे की नादानी, भटक रहा 
'अम्मा-अम्मा' वो पुकारता जंगल में 


दुनिया भर का ख़ुदा समझता था ख़ुद को 
कल वो दिखा पनाह माँगता जंगल में 

पहले उसने सारे दिये बुझा डाले 
अब वो सूरज-चाँद खोजता जंगल में   



   

    








 

Thursday, March 17, 2011

RANGPARV PAR

Yeh jo Holi

by Kumar Ravindra on Friday, March 18, 2011 at 10:15am

यह जो होली उदास है, भाई
कैसे कह दें कि खास है, भाई

कल हवाओं में रंग बिखरे थे
आज धुँधला उजास है, भाई

रंज़-ओ-ग़म इस कदर ज़माने में
ले रहा दिन उबास है, भाई

आयने में जो अक्स है दिन का
झुर्रियों का लिबास है, भाई

है गुफाओं की इसमें आबोहवा
और मरघट भी पास है, भाई

झील कब तक रहेगी ज़िंदा यह
कई सदियों की प्यास है, भाई

एक पत्थर-महल है बस्ती में
हो रहा वहीं रास है, भाई

कल जिसे लाये शाहजी अपने
यह वही नकली घास है, भाई

एक रंगीन ख़त मिला पिछला
उसमें रंगों की बास है, भाई


फाग होगा हवाओं में कल फिर
यही बस एक आस है, भाई
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Ritu-prsang

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आये फिर दिन 


उजले खरगोश-से  
          आये फिर दिन

धुंध के उतार वस्त्र
निकली है भोर  
मृगछौनी  धूप करे
डार-डार शोर 

लग रही है आँख-आँख  
          सचमुच कमसिन 

साबुन से धुली-धुली
फैल गयी साँस 
नीलकंठ हो गया 
नभ का संत्रास 

सपने उजियालों के  
           आँख रही बिन 

नहा रही दूध से
सूरज की धार 
खेल रहा यौवन फिर
बचपन के द्वार 

लगा रही बालों में 
         घास नये पिन  

क्षितिजों तक फैल गये 
धुले-धुले ठाँव
बाग-बाग खेत-खेत
बैठ रही छाँव 

कोयल की कूक रही
          सुधियों को गिन     





कैलेंडर में धूप 



आज फिर 
कैलेंडर में धूप है 
तारीखें गंधों की 
    आओ, दीवारों पर टाँगें 
         एक नये सूरज का जन्मदिन 

पिछली तारीखों में
रात थी - कोहरे थे 
असमी संध्याएँ थीं 
घटनाएँ थीं उदास 
थकी हुई साँसें थीं
वन्ध्या आस्थाएँ थीं

लिन्तु आज फिर
   वसंत के दिनांक हैं 
      किरणें हैं आतुर कमसिन   

कितने ही 
आतप-वर्षाएँ  
पतझर ' बर्फ झेलकर
लौटे हैं
रितुराजी सपने 
गीतों के लेकर आखर 

और गये वर्ष को उतार कर 
              फेंक रहे पलकों से 
                       नये-उगे छिन  
      

               
                                



एक जापानी सुबह 



आँख 'उगते सूरजों का देश' है 
आइये, कल्पित करें 
                एक जापानी सुबह

धूप 'गीशा गर्लहै  
उजली नहायी
नील नभ का कर रही स्वागत 
खिड़कियाँ सारी खुली हैं  
दिख रहे हैं
दूर तक के पथ 

बुद्ध-प्रतिमा-सा शांत ध्यानामग्न 
                     जल रहा है बह 

अतिथि सूरज के लिए 
हो रहा है 'चाय-उत्सव'
लॉन के मन में 
हाइकू लिखती हवाएँ हैं  
टहनियों पर 
साँवले वन में

यह नहीं 'हाराकिरी' का है समय 
              साँस से सपने रहे हैं कह 















यह अनोखी शाम



नदी का जल बह रहा है
     दूर
     तिरती जा रही है
            यह अनोखी शाम 

बीच धारा में खड़ी है
धुत सुनहली 
रोशनी की नाव
खे रही है डूबता सूरज
घाट पर से
टहनियों की छाँव 

कह रहे
अलविदा पनघट से
          झिलमिलाते घाम 

हो गया आकाश मद्धिम 
धूप की
परछाइयों को झेल 
रेत पर
अंतिम किरण के
बिछ गये हैं सोनपंखी खेल 

हर लहर में बस रहे हैं
फिर 
       चिनारों के नगर अविराम
                           













धूप की गिलहरी

बिजली के तारों पर  
        बैठे हैं फगुनाये सुग्गे 
       पेड़ों से उतर आयी लॉन पर 
                 धूप की गिलहरी 

एक फूल गुड़हल का 
खिल गया 
आँखों के बाग़ में 
साँस हुई शहनाई 
हरी हुईं इच्छाएँ 
कोंपल की बास से 
हो गयी सुनहरी परछाईं 

बेंच के किनारे तक 
   पहुँची धूप-गुलदुपहरी  

काँटों के बाड़ पर  
बिछे हुए यादों के गुलमोहर 
हो गये सलौने 
बौराये आम के
दरख्त के नीचे  बैठे 
मन के कस्तूरी मृगछौने  

उस पर अब 
  कोयल-मैनाओं की लग रही कचहरी   







पुष्पों की नयी कथा  


फगुनाये जंगल में 
      फिर पिछले साल 
सूरज को टाँग रहे जेब से निकाल 

उजले सूर्योदय ले 
किरणों के झुंड 
लगा रहे 
पेड़ों के भाल पर त्रिपुंड 

महक रहे यादों ें सरसिज के ताल 

पुष्पों की नयी कथा 
सुनते आकाश 
टेसू को साथ लिये
घूमते पलाश 

मन में फिर जगा रहे धूप के सवाल 

परियों के शिविर हुए 
सारे सीमांत 
सुख की इच्छाओं में 
साँस है अशांत 

नये वस्त्र पहन रहे पर्वत के ढाल















टँगे हुए जाल  



रेत बहुत गहरे हैं 
      छिछले हैं ताल 
ताक रहे सन्नाटे फावड़े-कुदाल 

पपड़ाये चेहरों पर 
टिकी हुई भूख 
गहराते मेंहों की
साँस गयी सूख

कौन कहे कितने हैं पथराये ताल 

आँगन को अगियाती 
रोज़ कड़ी धूप 
पानी हैं माँग रहे 
बौराये कूप 

दिन कैसे गुजरेंगे - पूछते पुआल 

दर्द ओढ़ सोते हैं 
मछुआरे गाँव 
झीलों से कहाँ गये 
मछली के ठाँव

सोच रहे खूँटी पर टँगे हुए जाल 












आहत हैं वन 



भूल गये मौसम मधुमास के वचन 
                           आहत हैं वन 

आखेटक कई खड़े 
सरहद के पार 
कोंपल की घटनाएँ
हो रहीं शिकार 

छूट रहे पेड़ों से हैं अपनेपन 

काँप रहे ऋतुओं के 
आखिरी पड़ाव 
साँझ-ढले 
पतझर के हैं गहरे दाँव

नीरव में गूँज रहे अपराधी छन 

धुंध के किलों में 
है बंदी आकाश 
संकट से घिरा हुआ 
फागुनी पलाश 

एकाकी डूबा है सोच में विजन 












बीमार रितु के आँकड़े



पीली हवाएँ लौट आयीं 
           नीम के पत्ते झड़े 
               नंगे बदन सूरज खड़े 

साये हवा में उड़ गये
ढाँचे हुए सारे तने  
केवल बचे हैं ठूँठ कुछ 
बूढ़ी सुबह के सामने 

दालान की है नींद टूटी 
               रास्ते सूने पड़े 

पोखर-किनारे के शिवाले 
सोचते चुपचाप हैं -
क्यों जल अकेले धूप में 
सोये हुए मुँह-ढाँप हैं 

गिनती लहर है रात-दिन  
            बीमार रितु के आँकड़े