Friday, March 18, 2011

Kuchh Gazalen

इन रचनाओं के किसी भी रूप में उपयोग हेतु कुमार रवीन्द्र से पूर्व-अनुमति लेना आवश्यक है -


ग़ज़ल 


एक घायल फाख्ता हमको मिला 
नीड़ भी उजड़ा हुआ हमको मिला

बहुत ढूँढ़ा हर तरफ बेकार ही  
दर्द सीने में छिपा हमको मिला 

पत्तियाँ उड़कर गईं किस ओर हैं 
यह हवाओं से पता हमको मिला 

आई जंगल की खबर अख़बार में
इधर बरगद काँपता हमको मिला 

रात-भर जाने कहाँ भटका है ये 
सुबह से सूरज थका हमको मिला 





ग़ज़ल 



धुएँ की मंजिल नहीं थी यह नदी तो 
कभी भी कातिल नहीं थी यह नदी तो 

खून से क्यों तर-ब-तर है धार इसकी 
युद्ध में शामिल नहीं थी यह नदी तो 

नाव इस पर कोई भी साबुत नहीं अब 
इस कदर बेदिल नहीं थी यह नदी तो 

खबर है कि नदी ज़हरीली हुई है 
नागिनों का बिल नहीं थी यह नदी तो 

पीढ़ियाँ आईं-गईं, पर आँसुओं से 
इस तरह बोझिल नहीं थी यह नदी तो 

ग़ज़ल 



कहाँ सपनों का है घर, देखिये तो 
ज़रा इस ओर आकर देखिये तो 

उमड़कर आ रहा जो चाँदनी में  
समुंदर को नज़र भर देखिये तो 

हज़ारों जले चाँदी के दिए हैं 
उधर पेड़ों के ऊपर, देखिये तो  
   
हँसी गूँजी किसी मेहरुन्निसा की  
इधर उड़ते कबूतर देखिये तो 

सुनहरे अक्स चारों ओर बिखरे
सुबह का है ये मंजर, देखिये तो    

किसी कान्हा की कलगी में लगा था 
गिरा यह मोर का पर, देखिये तो 

नहीं यह जिस्म, परियों की गुफा है 
हमें भी, यार, छूकर देखिये तो 





ग़ज़ल 



कल बात हुई घर में गीतों की किताबों की 
हाँ, महक भरी है फिर आँगन में गुलाबों की  

इस आइने को देखो, बेताब हो रहा  है 
यह बाट जोहता है कनखी के ज़वाबों की 

इंसान की है फितरत, वो ख्वाब में जीता है 
लंबी नहीं होती है यों उम्र शबाबों की  

हमने शहर है देखा, डूबा था तरन्नुम में 
सुर-ताल सभी उलटे, महफ़िल थी नवाबों की  

पलकों में हमारे है सपनों की नई सूरत 
फेहरिश्त है लंबी यों टूटे-हुए ख्वाबों की 




ग़ज़ल 


गीत पुराना उसने खत में ख़ास लिखा 
हमने भी कल आँसू का इतिहास लिखा  

करते भी क्या, कुछ-न-कुछ तो लिखना था 
दूर रहा जो, उसको भी था पास लिखा 

नदियों के सीने में आग सुलगती है 
हमने जलते जंगल में मधुमास लिखा 

इसी किनारे पर कल सूरज डूबा था 
यहीं हारकर हमने 'चाँद उदास' लिखा 

काले कोसों भटके हम, अब है जाना 
सबके मन में जीवन का विश्वास लिखा 

हँसी-ख़ुशी से भरा हुआ था राजभवन 
दरवाजे पर किसने यह 'वनवास' लिखा

सिन्धु-पार की आबोहवा लगी ऐसी 
हमने अपनी साँस-साँस पर 'प्यास' लिखा 

आखिर में हमने बच रहे हाशिये पर 
'बहुत पुरानी इस घर की बू-बास' लिखा 




ग़ज़ल 


हमें दिखा कल एक कबूतर जंगल में 
पहले भी थे बसे देवता जंगल में 

कुछ दिन पहले एक सुनहरा हिरन दिखा 
पत्ता-पत्ता मिला काँपता जंगल में 

जिसकी आँखों में करुणा का सागर था
वही मसीहा हुआ लापता जंगल में 

देखें बच्चे की नादानी, भटक रहा 
'अम्मा-अम्मा' वो पुकारता जंगल में 


दुनिया भर का ख़ुदा समझता था ख़ुद को 
कल वो दिखा पनाह माँगता जंगल में 

पहले उसने सारे दिये बुझा डाले 
अब वो सूरज-चाँद खोजता जंगल में   



   

    








 

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