Wednesday, July 6, 2011

Ye Kuchh Bangkok Yatra se upje Geet

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साँझ ढल चुकी 

साँझ ढल चुकी 
आओ ...
चलो टहलकर आते हें , सजनी 

बोर हुए बैठे-बैठे 
कमरे के अंदर 
चलो, देखकर आते हैं
क्या करता सागर 

उसके 
नभ-धरती 
दोनों से गहरे नाते हैं, सजनी 

चाँद-लहर के खेले 
होते होंगे उस पर 
हँसते होंगे टापू 
उनके खेल देखकर 

इसी समय तो 
जल-देवा 
तट पर आ जाते हैं, सजनी 

सीपी-शंख और घोंघे 
बीनेंगे मिलकर 
साथ लिखेंगे रेती पर हम 
ढाई आखर 

दोहरायेंगे गान 
जिन्हें 
जलपाखी गाते हैं, सजनी 

 कुछ दिन पहले  

कुछ दिन पहले 
गीत मिला था
दूर देश के सागर तीरे  

चकित हुआ था 
देख वहाँ के हाट-लाट को 
पिकनिक वहाँ मनाने आये 
पर्यटकों के ठाठ-बाट को 

पॉप धुनों पर 
बजते देखे 
शंख-बाँसुरी-झाँझ-मंजीरे  

'पैरा-सेलिंग'
'अंडर सी वाकिंग' के खेले 
अधनंगे आदम-हव्वा के
देखे उसने कई झमेले 

टापू से 
लहरें टकराईं 
बिखरे तट पर अनगिन हीरे 

मन्दिर में देखी उसने 
सोने की मूरत
और हाट में मिली उसे 
बिकती जलपरियों की थी किस्मत 

चौंका पहले 
किन्तु रम गया 
उन खेलों में धीरे-धीरे 


देव मूँदे आँख लेटे 

और ...
मन्दिर में खड़े हम मौन हैं
                 देव मूँदे आँख लेटे

देह उनकी हुई 
सोने का हिरन है 
पास की दीवार भी 
सोनल-बरन है 

रात-भर
अंधी गुफा-सा रहा मन्दिर 
                रहा सपनों को लपेटे 

दर्शकों की भीड़ 
बढ़ती जा रही है 
कैमरे की जोत भी 
भरमा रही है 

घोर अचरज  
सोचते हैं सभी दर्शक 
       वही केवल देवता के सगे बेटे

सोन-पत्तर के तले हैं  
घाव गहरे
देवता पर यक्ष के हैं 
कड़े पहरे  

नये युग के 
हाट की माया अलौकिक 
                      आये देवा भी चपेटे 

जंतुपुरी के खेले देखे 

साधो, हमने 
दूर देश में 
नये वक्त के मेले देखे 

देखीं अधनंगी जलपरियाँ 
सागर-तीरे धूप नहाती 
आधी-रातों 'डिस्कोथेक' में 
देखी जलती-बुझती बाती 

महासभ्य 
सपनों को देखा 
जंतुपुरी के खेले देखे  

महल-दुमहले सोनल देखे 
उन्हें परखते सैलानी भी 
सुनी पॉप म्यूजिक की तानें 
अनजानी बोली-बानी भी 

सोना-मढीं 
मूरतें देखीं 
पूजाघर अलबेले देखे 

बादल-छूती लाटें देखीं 
'फ्लोटिंग' हाटों में भी भटके 
एक पुराना पुल भी देखा 
देखे उससे सूरज लटके 

वहीँ घाट पर 
थकी नदी के 
देवा खड़े अकेले देखे 

दिन मिठाया 

गीत हमको
मिला कल सागर किनारे 

वह सगर-कन्याओं से 
बतिया रहा था 
उधर सागर 
सीपियाँ बिखरा रहा था 

दिन मिठाया
ढला सूरज-उगे तारे 

दिखी पूनो 
घाट पर दीपक सिराती
गीत ने बाँची
तभी थी नेह-पाती 

याद आये 
हमें भी सपने कुँवारे  

दूर टापू पर 
बजी थी बाँसुरी-धुन
पास के इस ताड़वन में 
हुई गुनगुन 

आरती होती 
हवा ने तभी मंतर थे उचारे 

देखो, सजनी 


देखो, सजनी 
तट पर सागर फेंक गया है 
           सीपी-घोंघे-मरी मछलियाँ 

बियरकैन-प्लास्टिक के थैले 
सभ्य समय का कूड़ा-करकट 
दिन भर इसने सहा उपद्रव 
रहा रात भर लेता करवट 

दूर कहीं से 
बहकर आये सड़े नारियल 
 किसिम-किसिम की झड़ी पत्तियाँ

इधर पड़ा है गजरा कुचला 
किसी पाप की गाथा कहता 
उधर खड़ी चट्टान अकेली 
सागर उसके नीचे बहता 

देश-देश के 
सैलानी आते इस तट पर 
     करने केवल मौज-मस्तियाँ 

खाड़ी के उस दूर सिरे पर 
मीनारों में जो कुछ होता 
उसे देखकर रोज़ रात में 
सागर अपना आपा खोता 

सुबह-सुबह
आ गईं किनारे, देखो, कितनी 
       मोटर बोटें-लांच-किश्तियाँ 



         


1 comment:

  1. आप का पिछला यात्रा संस्मरण बहुत अच्छा लगा , चित्र नहीं दिखे , दुबारा डाल सके तो आभार होगा . बैंकोक यात्रा के संस्मरण पर कविता मन को छू गयी . यात्रा सचित्र संस्मरण भी दे . आप को पढना सुखकर हैं

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