Sunday, July 10, 2011

Navgeet Shahar-sndarbh ke

एकांत और अकेलापन -ये विरोधी मनस्थितियाँ कई बार एक साथ उपस्थित होती हैं, विशेष रूप से जहाँ स्वयं की पहचान के खो जाने का खतरा सबसे अधिक होता है जैसे एक महानगरी के  महाहाट के भीड़भाड़ भरे परिवेश में| वस्तुतः यह समस्या दोहरी है - एक ओर है स्वयं के व्यक्तित्त्व के बिला जाने का भय और दूसरी ओर है किसी नितांत अपने संगी का न होना, जो हमारे सुख-दुख का सहज साक्षी हो सके| नवगीत में इस महासंकट का ज़िक्र अलग-अलग पहलुओं से बड़े ही सशक्त रूप में हुआ है| महानगरीय जिजीविषा की एक त्रासदी यही रही है| नवगीत पाठशाला में इस विषय को एक बार फिर उठाना जहाँ एक ओर नवगीत को इन सन्दर्भों से पुनः जोड़ना है, वहीँ दूसरी ओर पहले की मनस्थितियों की पुनरावृत्ति भी है| मेरी राय में रोचक रहेगा यह सन्दर्भ| देखें कुमार रवीन्द्र के इस सन्दर्भ के कुछ नवगीत -


महानगरी राजधानी 

महानगरी
राजधानी धूप की 
बुन रही गहरे अँधेरे 

घूमता है घनी सडकों पर 
एक बहरा शोर 
साँझ तक फैली गुफाओं का 
है  कोई छोर 

सोच में डूबी 
निकलती हैं 
यातनाएँ हर सबेरे 

बहुत उजले और ऊँचे हैं
रोशनी के पुल  
किन्तु उनकी छाँव में पलते
सिर्फ़ अंधे कुल

लोग कंधों पर
उठाये घूमते
उजड़े बसेरे

भीड़ है-
बाज़ार में उत्सव और मेले हैं 
छली चेहरों की नुमायश है 
घर अकेले हैं 

एक छल है
आइनों का    
सभी को परछाईं घेरे  



टूट बिखरे ढाई आखर



टूटकर बिखरे सडक पर
                   ढाई आखर
   भीड़ इतनी - क्या करें घर

शोर गलियों में
कि सूरज बुझ गया है
रास्तों पर दिन पुराने 
डर नया है

बंद कमरों में हवाओं के
                         थके पर
    भीड़ इतनी - क्या करें घर  


मोल रिश्तों के
अधूरे इस शहर में
पेड़ की फुनगी 
हुई अंधी 
अचानक दोपहर में

पाँव ये टिकने  पाते हैं  
                       घड़ी भर 
     भीड़ इतनी - क्या करें घर


जलसेघर की शाम 



चढ़े मुखौटे 
बजा पियानो 
थिरक उठी फिर जलसेघर की शाम

कुछ पल चहके 
कुछ पल डूबे
घने अँधेरे 
जिए देर कुछ
टूटे हुए नशे के घेरे 

लौट आये फिर
दर्द अकेले 
थके  हाथ में पकड़े खाली ज़ाम

बात-बात पर
हठी कहकहे रहे अधूरे 
दिन के पछतावे 
सूनेपन हुए  पूरे 

खानापूरी 
खुली खिड़कियाँ 
खड़ी रह गयीं सन्नाटों के नाम 


चेहरों को खोजें 


शहर बड़ा 
हैं नाज़ुक रिश्ते 
           आइये निभायें

ऊँची मीनारों के
जंगल में 
दूर-दूर घूमें 
सारे इस शोरगुलगपाड़े में 
शामिल हो झूमें 

खोये हुए चेहरों को खोजें
                    उनसे बतियायें

एक नदी बहती है
भीड़ की
उसमें हम डूबें 
भागदौड़ करती 
इन सड़कों पर
अपने से ऊबें 

बीत गया दिन
इसका उत्सव 
          आइये मनायें

मन का वासी बड़ा अकेला
मन का वासी बड़ा अकेला
                    महानगर में 

खोज रहा वह 
सड़कों पर पुरखों की थाती 
'डिस्कोथेक' में 
मंदिर के दीये की बाती 

अंधे युग का चलता खेला 
                    महानगर में 

उसने देखी 
चहल-पहल थी नदी-घाट की
मुँह-बाये वह देख रहा  
घटनाएँ हाट की 

नई तरक्की का है मेला 
                    महानगर में 

लाया था वह 
वंशी के मीठे सुर घर से 
वे बौराए  
राजपथों की जगर-मगर से 

पॉपधुनों का स्वर अलबेला 
                   महानगर में 




         

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