बरगद ठूँठ हुआ
बरगद अपने आँगन में था
कल वह ठूँठ हुआ
उसकी जड़ को
पता नही कब दीमक चाट गई
अमरबेल लडकों ने रोपी
घर में नई-नई
पुरखों ने पाला-पोसा था
अंधा हुआ सुआ
सगुन-चिरइया का जोड़ा
बरगद पर रहता था
तब बरगद भी
रामराज की गाथा कहता था
उसके साये देते थे
सपनों की हमें दुआ
परिक्रमा करते थे उसकी
सूरज-चाँद सभी
हमें न व्यापी उसके रहते
विपदा कोई कभी
'वटसावित्री' पर किसको
पूजेंगी बड़ी बुआ
बरगद काँपा
बरगद काँपा
नई सड़क बन रही पास में
गंध भर गई तारकोल की
उसके सीने में
ट्रक दौड़ेंगे खुली सड़क पर
एक महीने में
डरी गिलहरी
छिपकर बैठी जली घास में
जाएँ कहाँ अब
बरगद पर के पंछी सोच रहे
पत्ते झरे नए भी
पुरखों की अब कौन कहे
बरगद, सुनते
आड़े आता है विकास में
ग्रामवधू खुश
दरवज्जे तक बस अब आएगी
दूर शहर भी पास हुआ
जब चाहे जाएगी
नया मॉल
बन रहा वहाँ है हौज़ ख़ास में
दादी का जला हिया
आँगने लगाया था
बरगद एक बाबा ने
हमने कटवा दिया - दादी का जला हिया
आतीं थीं गली की सुहागिलें
उसको नित पूजने
बरसों तक रक्खा गुलज़ार उसे
ऋतु-पंछी की गूँज ने
एक कुआँ था घर में
पुरखों के वक्त का
हमने पटवा दिया - दादी का जला हिया
आसमान को छूती
फुनगी थी बरगद की
आती थी झूलने बहना सँग
भाभी भी अहमद की
उनके घर का पीपल
आता इस ओर था
हमने छँटवा दिया -दादी का जला हिया
सुरज देव -चंदा भी
बरगद के फेरे नित करते थे
सावन में बदरा जब छाते थे
आँगन में अमृत-कण झरते थे
एक था पुराना
तुलसीचौरा भी आँगने
हमने हटवा दिया - दादी का जला हिया
बाबू-अम्मा नेह-गाछ थे
अम्मा थीं
बरखा के जल-सी
बाबूजी थे सुरज देवता
सींचा अम्मा ने
बाबू ने सहज तपाया
कल्पवृक्ष की
हमें मिली थी घर में छाया
बाबू-अम्मा
नेह-गाछ थे
हम हैं उसके गुल्म औ' लता
पुन्न उन्हीं का
पाप-ताप जग के सब झेले
रहे अछूते
हाट-लाट के देखे खेले
सीख मिली उनसे
उससे ही
गलत-सही क्या - हमें है पता
उनसे पाये संस्कार
गौरी-गौरे के
कभी शंखध्वनि
कभी दिये हैं हम चौरे के
देवालय में
अम्मा-बाबू का ही
हमको रूप दीखता
माँ रहीं घर में इबादत की तरह
हो गया घर भी दुआघर की तरह
आरती के दिये-सी जलती रहीं
वो महकती रहीं चंदन की तरह
हमने दी आवाज़ उनको जब कभी
गूँज बनकर रहीं गुंबद की तरह
उनके जाने पर हमारी आँख कल
खूब बरसी किसी बादल की तरह
बज रहीं हैं याद में अम्मा कहीं
किसी मीठे राग की गत की तरह
रविन्द्र जी
ReplyDeleteआप अपने ब्लॉग पर फॉण्ट बड़े कर दे पढ़ने में आसानी होगी
आप को निरंतर पढ़ती हूँ
सादर
रचना
बज रहीं हैं याद में अम्मा कहीं
ReplyDeleteकिसी मीठे राग की गत की तरह
bilkul sahii kehaa haen aap ne
maa ki yaad isii tarah aatee haen